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    भ्रष्टाचार के मामलों में सर्किल अफसरों पर भी कसेगा शिकंजा:फर्नीचर कारोबारी से 4.72 लाख रुपये की वसूली पर उठे सवाल, डीआईजी दिखे सख्त

    1 day ago

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    मेरठ में नोएडा के फर्नीचर कारोबारी से 4.72 लाख रुपये की वसूली के मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले को अफसरों ने सिर्फ थाने की लापरवाही तक सीमित नहीं माना है बल्कि सर्किल स्तर पर भी जवाबदेही का मुद्दा बताया है। डीआईजी रेंज कलानिधि नैथानी ने माना है कि थाने से संबंधित शिकायतों पर सुनवाई की पहली जिम्मेदारी सर्किल अफसर और दूसरी एडिशनल एसपी स्तर के अधिकारी की है। अगर इन दोनों स्तरों पर शिकायत का निष्पक्ष और प्रभावी निस्तारण हो जाए तो पीड़ित को उच्चाधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाने की नौबत ही नहीं आएगी। डीआईजी ने विवादित और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में सर्किल अफसरों की जिम्मेदारी तय करने की जरूरत बताई है। इस रुख से साफ है कि अब किसी मामले में केवल थाना प्रभारी की भूमिका ही नहीं बल्कि शिकायत की जानकारी होने के बावजूद उचित कार्रवाई नहीं करने वाले पर्यवेक्षण अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ सकती है। मेरठ में भी पुलिस कार्रवाई से जुड़े विवादों ने जवाबदेही की जरूरत को सामने रखा है। मेरठ में हाल के मामलों ने बढ़ाई चिंता केस-1 : नोएडा के कारोबारी से कथित वसूली के मामले में सर्किल अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल खड़े हुए हैं। वहीं जमीनी विवाद में मुकदमे से नाम हटाने के बदले 20 हजार रुपये मांगने के आरोप में मवाना खुर्द चौकी प्रभारी विकास कुमार, दरोगा नीरज कुमार व कांस्टेबल सचिन कुमार को निलंबित किया गया। केस-2 : मेरठ के लोहियानगर थाना क्षेत्र में धागा कारोबारी रासिक पुत्र इदरीश से 20 लाख रुपये की कथित वसूली के आरोप में थाने में तैनात दो दरोगाओं लोकेश साहू व महेश गंगवार को निलंबित किया गया था। जांच में आरोपों को गंभीर मानते हुए कार्रवाई की गई और थाना प्रभारी की भूमिका भी जांच के दायरे में आई। जनसुनवाई की व्यवस्था में कहां है कमी पुलिस व्यवस्था में थाना प्रभारी के बाद सर्किल अधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। थाना क्षेत्र में विवाद, अवैध वसूली या पुलिसकर्मियों के आचरण से संबंधित शिकायत मिलने पर सीओ से अपेक्षा रहती है कि वह तथ्यों की निष्पक्ष जांच करें। शिकायत का समाधान न होने पर मामला एसपी या एसएसपी तक पहुंचता है। इसके बाद भी कार्रवाई नहीं होने पर पीड़ित को डीआईजी या अन्य उच्चाधिकारियों के पास जाना पड़ता है। डीआईजी कलानिधि नैथानी का जोर इसी व्यवस्था को प्रभावी बनाने पर है। उनका कहना है कि सर्किल अधिकारी और एडिशनल एसपी स्तर पर शिकायत की सही सुनवाई होनी चाहिए। विवादित और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में यदि पर्यवेक्षण अधिकारी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते तो उनकी भूमिका भी तय की जानी चाहिए। अब इन सवालों के जवाब जरूरी - क्या थाने में शिकायत मिलने के बाद सर्किल अधिकारी ने उसकी समीक्षा की। - क्या जांच अधिकारी ने पीड़ित से बात करके उसके साक्ष्यों की जांच की। - क्या शिकायत के निस्तारण की रिपोर्ट तथ्यों पर आधारित थी या औपचारिकता निभाई गई। - क्या भ्रष्टाचार या वसूली के आरोपों में संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हुई। - क्या बार-बार शिकायत सामने आने वाले थानों और सर्किलों की अलग से समीक्षा की जाएगी। कार्रवाई के साथ निगरानी भी जरूरी नोएडा के कारोबारी से कथित वसूली का मामला इस लिहाज से अहम है कि इसमें पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के साथ जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। डीआईजी ने सीओ कोतवाली संग्राम सिंह को पीड़ित से बात किए बिना जांच पूरी करने के मामले में चेतावनी दी है। प्रकरण की आगे की जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपों की पुष्टि होना बाकी है। पर्यवेक्षण अधिकारी की तय हो जवाबदेही ऐसे मामलों में निलंबन या विभागीय जांच तत्काल कदम हो सकते हैं, लेकिन स्थायी सुधार के लिए शिकायतों की नियमित समीक्षा, जांच की गुणवत्ता का आकलन और पर्यवेक्षण अधिकारियों की जवाबदेही भी जरूरी है। जनसुनवाई तभी प्रभावी होगी, जब पीड़ित की शिकायत को केवल आगे भेजने के बजाय उसका निष्पक्ष निस्तारण सुनिश्चित किया जाए।
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