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    हाईकोर्ट बोला-खुद को कानून से ऊपर समझ रही यूपी पुलिस:FIR से पहले युवक को हिरासत में लिया; दस्तावेजों में गड़बड़ी, तुरंत रिहा करो

    5 hours ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस को फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा- पुलिस खुद को कानून से ऊपर समझती है। उसे लगता है कि मनमानी करना उसका अधिकार है। उसकी गलतियों पर कोई सवाल नहीं उठाएगा। अगर सवाल उठ भी गए तो वह बहानेबाजी करके बच निकलेगी। कोर्ट नोएडा के रहने वाले दीपक को FIR दर्ज होने से पहले हिरासत में लेने के मामले से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस अतुल श्रीधरन और अचल सचदेव की खंडपीठ ने दीपक की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए हिरासत को पूरी तरह से गैर-कानूनी करार दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर दीपक किसी अन्य मामले में वॉन्टेड नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने ACP कमलेश कांत और विवेचनाधिकारी अनुज कुमार की सर्विस फाइल में लापरवाही का 'बैड रिमार्क' दर्ज करने का निर्देश दिया। पहले पूरा मामला सिलसिलेवार तरीके से समझ लीजिए- मामला 23 अगस्त 2026 का है। पुलिस के रिकॉर्ड के मुताबिक, प्रॉपर्टी के विवाद में दो पक्षों के बीच विवाद हुआ। उसी दिन शाम 7:34 बजे दीपक और चार अन्य लोगों को हिरासत में लिया गया, जबकि एफआईआर रात 9:39 बजे दर्ज की गई। दीपक की गिरफ्तारी 24 अगस्त 2026 को दोपहर 2:57 बजे दिखाई गई। गिरफ्तारी और तलाशी से जुड़े दस्तावेजों में 5 जगह 23 अगस्त की तारीख दर्ज थी, जबकि गिरफ्तारी 24 अगस्त की दिखाई गई। अब जानिए कोर्ट ने क्या-क्या कहा? हाईकोर्ट ने पाया कि FIR दर्ज होने से पहले ही पुलिस दीपक को हिरासत में ले चुकी थी। बाद में हिरासत के दौरान औपचारिक गिरफ्तारी की गई। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी की वजह साफ-साफ रिकॉर्ड की जानी चाहिए, न कि दस्तावेजों को सिर्फ खानापूर्ति के लिए तैयार किया जाए। कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ने 23 अगस्त की तारीख वाले दस्तावेज पर साइन किए, जबकि गिरफ्तारी की तारीख 24 अगस्त लिखी गई। तलाशी और जब्ती से जुड़े दस्तावेजों में 23 अगस्त की तारीख दर्ज थी। कोर्ट ने कहा कि 5 जगह तारीखों में गड़बड़ी मिली, लेकिन उन्हें न तो सुधारा गया और न ही संशोधन को प्रमाणित किया गया। जांच अधिकारी अनुज कुमार ने इसे तारीख लिखने में हुई गलती बताया, लेकिन यह बात गले से उतरने वाली नहीं है। बॉन्ड में रकम का कॉलम खाली, साइन, तारीख और समय भी नहीं कोर्ट को सुरक्षा कार्रवाई के दस्तावेजों में भी कमियां मिलीं। बॉन्ड में रकम का कॉलम खाली था। उस पर जरूरी साइन, तारीख और समय भी दर्ज नहीं थे, जिससे यह पता चल सके कि ACP ने बॉन्ड मंजूर किया या नहीं। 24 अगस्त के नोटिस पर एसीपी-II कमलेश कांत के साइन थे, जबकि नोटिस एसीपी-I के नाम से जारी हुआ था। इन बातों के आधार पर हाईकोर्ट ने संदेह जताया कि हो सकता है कि कागजातों को बाद में भरा गया हो। दीपक से खाली कागज पर साइन करा लिए गए हो। बाद में जांच अधिकारी ने उस पर साइन किया और गिरफ्तारी की वजह लिखने के लिए ऊपर की जगह खाली छोड़ दी गई। तनावपूर्ण हालात कानून तोड़ने का बहाना नहीं राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि घटना के समय तनावपूर्ण स्थिति थी। मौके पर भीड़ थी। पुलिस ने हालात बिगड़ने से रोकने के लिए कार्रवाई की। इस पर हाईकोर्ट ने साफ किया कि तनावपूर्ण परिस्थितियां पुलिस को कानून का पालन करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करतीं। गिरफ्तारी और हिरासत की प्रक्रिया का पालन करना पुलिस का दायित्व है। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के कारण जानने और कानूनी संरक्षण पाने का अधिकार नागरिकों को मिला है। पुलिस कानून की अनदेखी नहीं कर सकती। हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। कहा कि उन्होंने यह नहीं जांचा कि कार्रवाई में कानून का पालन किया गया या नहीं। यह गंभीर चूक है। अफसरों को सिखाया जाए कि कानून की सही प्रक्रिया क्या है? कोर्ट ने एसीपी कमलेश कांत और जांच अधिकारी अनुज कुमार के काम करने के तरीके पर नाराजगी जताई। कहा कि इन दोनों अफसरों को नए आपराधिक कानून (बीएनएसएस) के नियमों और सही प्रक्रिया की जरा भी जानकारी नहीं है। कोर्ट ने डीजीपी से कहा कि वे पुलिस अफसरों को ट्रेनिंग देने के लिए एक सिस्टम बनाएं। अफसरों को यह सिखाया जाए कि कानून की सही प्रक्रिया क्या है। किसी को गिरफ्तार करने के नियम क्या हैं। आम जनता के अधिकारों का ध्यान कैसे रखा जाता है। कोर्ट ने कहा- ऐसी कार्रवाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी कोर्ट ने उन मामलों पर भी चिंता जताई, जिनमें संदिग्धों को कथित तौर पर 24 घंटे से अधिक समय तक थाने में रखा जाता है और बाद में छोड़ दिया जाता है। खंडपीठ ने चेतावनी दी कि भविष्य में कानूनी प्रक्रिया की जानकारी न होने का बहाना बनाकर ऐसी कार्रवाई को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सुप्रीम और हाईकोर्ट ने कब-कब यूपी पुलिस को फटकार लगाई, पढ़िए 1 साल पहले यूपी में सिविल मुकदमों को क्रिमिनल केस में बदले जाने पर सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस (CJI) संजीव खन्ना ने नाराजगी जताई थी। कहा था- यूपी में जो हो रहा है, वह गलत है। हर रोज सिविल मुकदमों को आपराधिक मामलों में बदला जा रहा है। यह बेतुका है। पढ़ें पूरी खबर 5 महीने पहले नोएडा के 2021 के हेट क्राइम मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- जांच अधिकारी (IO) सही तरीके से पेश नहीं हो रहे हैं। IO अदालत के साथ ‘हाइड एंड सीक’ (लुका-छिपी) जैसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं? पढ़ें पूरी खबर 3 महीने पहले यूपी पुलिस के ‘हाफ एनकाउंटर’ तरीके पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने कहा- पुलिस अधिकारी सिर्फ तारीफ, प्रमोशन और सोशल मीडिया पर वाहवाही के लिए अनावश्यक तरीके से गोली चला रहे हैं। आरोपी को सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं। पढ़ें पूरी खबर 20 दिन पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अवैध हिरासत के मामले में देवरिया एसपी अभिजीत आर. शंकर को कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा- अफसर ‘झूठों के झुंड’ हैं। इतनी बड़ी लापरवाही के बाद भी SHO को सस्पेंड क्यों नहीं किया गया? माफी अदालत से नहीं, बल्कि हिरासत में रखे गए लोगों से मांगिए। पढ़ें पूरी खबर 16 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक बाइक सवार से जुड़े मामले में पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने कहा- अगर पुलिस के हर कदम में कोई न कोई एजेंडा दिखेगा तो आम लोग उस पर भरोसा कैसे करेंगे। हालात ऐसे हो गए हैं कि पुलिस से जुड़े सभी मामलों की जांच CBI को दे दी जाए। पूरे पुलिस विभाग को ही भंग कर दिया जाए। पढ़ें पूरी खबर ----------------------- ये खबर भी पढ़िए- सुप्रीम कोर्ट बोला- पुलिस पर भरोसा कैसे करें:CBI को सारे मामले सौंप दें; इस बकवास को कभी न कभी तो बंद करना होगा सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस को फटकार लगाई है। पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा- अगर पुलिस के हर कदम में कोई न कोई एजेंडा दिखेगा तो आम लोग उस पर भरोसा कैसे करेंगे। पूरी खबर पढ़िए
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