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    हाईकोर्ट ने गोंडा DM का आदेश रद्द किया:गुंडा घोषित कर 6 महीने के लिए जिलाबदर किया था, पुलिस ने गलत तस्वीर पेश की

    11 hours ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने गोंडा के एक शख्स को गुंडा घोषित कर 6 महीने के लिए जिला बदर करने का जिलाधिकारी का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि जिस मामले में कोई शख्स बरी हो चुका है, उसे दोबारा गुंडा घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। साथ ही, 2020 के सिर्फ एक लंबित आपराधिक मुकदमे के आधार पर 2026 में गुंडा अधिनियम की कार्रवाई सही नहीं है। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने यह आदेश गोंडा निवासी जाहिद अली की याचिका पर दिया। कोर्ट ने गोंडा के जिलाधिकारी के 11 मई 2026 के आदेश और देवीपाटन मंडल के कमिश्नर के 12 अगस्त 2026 को अपील खारिज करने के आदेश को कानून की नजर में सही नहीं मानते हुए रद्द कर दिया। बरी करने के बावजूद दो मुकदमे लंबित बताए याचिकाकर्ता को गुंडा अधिनियम की धारा 3(1) के तहत 6 महीने के लिए गोंडा जिले से बाहर कर दिया गया था। जिलाधिकारी ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर उसके खिलाफ 2010 और 2020 के दो आपराधिक मुकदमों और एक बीट सूचना रिपोर्ट को आधार बनाया था। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि 2010 के मुकदमे में उसे 26 अगस्त 2017 को ही गोंडा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने बरी कर दिया था। इसके बावजूद कमिश्नर ने अपील खारिज करते समय दोनों मुकदमों को उसके खिलाफ लंबित बताया। कोर्ट ने कहा कि कमिश्नर के आदेश में बरी होने की बात लिखी होने के बाद भी इस पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया। यह आदेश में लापरवाही की गलती है। कोर्ट ने कहा कि गुंडा अधिनियम के तहत किसी शख्स को गुंडा घोषित करने के लिए उसका आदतन अपराधी होना जरूरी है। एक या दो घटनाएं किसी को आदतन अपराधी मानने के लिए काफी नहीं हैं। कथित अपराधों और समाज पर उनके असर के बीच भी सही संबंध होना चाहिए। 2020 के मुकदमे और 2026 में गुंडा घोषित करने के बीच 6 साल का अंतर है। ऐसे में दोनों के बीच कोई सही संबंध नहीं है।
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