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    लखनऊ विश्वविद्यालय में 'जियोकॉन–2026' संगोष्ठी:20 प्रमुख राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों के वैज्ञानिक, शिक्षाविद् हुए शामिल

    1 hour ago

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    लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में शुक्रवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'जियोकॉन–2026' का आगाज हो गया है । जिसका विषय 'भूविज्ञान और जलवायु परिवर्तन हेतु सतत पर्यावरण' रहा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि युद्ध और संसाधनों का अंधाधुंध दोहन नहीं रुका, तो आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ नहीं बचेगा। संगोष्ठी के संयोजक और भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. ध्रुवसेन सिंह ने कहा कि वर्तमान में हो रहे युद्धों में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक अस्त्र-शस्त्र जलवायु परिवर्तन की रफ्तार बढ़ा रहे हैं। इससे ग्लोबल वार्मिंग में तेजी आई है। उन्होंने बताया कि अगर हम एक 'सस्टेनेबल' पृथ्वी चाहते हैं, तो हमें 'ग्रीन एनर्जी' और 'ग्रीन इकोनॉमी' को अपनाना होगा। पृथ्वी हमें जीवन के लिए ऑक्सीजन, पानी और खनिज दे रही है, लेकिन मानवीय गतिविधियों ने इसे संकट में डाल दिया है। हिमालय में चट्टानों के गिरने का वैज्ञानिक समाधान ​IIT पटना के निदेशक प्रो. टी.एन सिंह ने पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाले भूस्खलन और चट्टानों के गिरने (Rockfall) पर व्याख्यान दिया। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में बनने वाली 'अर्ध-सुरंगों' के सुरक्षित निर्माण के लिए डायनेमिक रॉकफॉल एनालिसिस की जरूरत बताई। ​खास बातें: जो चर्चा में रहीं ​ब्लू इकोनॉमी: NIO गोवा के निदेशक प्रो. सुनील सिंह ने बताया कि महासागर भविष्य की अर्थव्यवस्था के आधार हैं।​एनर्जी सिक्योरिटी: AMD हैदराबाद के निदेशक डॉ. धीरज पांडे ने नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य के लिए रणनीतिक खनिजों के महत्व पर चर्चा की ।​ प्रो. अरविंद मोहन ने कहा कि आज दुनिया में जितने भी अंतरराष्ट्रीय संघर्ष हो रहे हैं, उनके पीछे प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की होड़ है। 200 से अधिक शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए ​सम्मेलन में देश के 29 विश्वविद्यालयों और लगभग 20 प्रमुख राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों के वैज्ञानिक, शिक्षाविद और शोधार्थी भाग ले रहे हैं। पहले दिन आठ विशेष व्याख्यान आयोजित हुए और 200 से अधिक शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।कार्यक्रम में डॉ. स्नेहा रघुवंशी, डॉ. ज्योत्सना दुबे, डॉ. मनोज यादव,प्रो. एमजी ठक्कर, राजिंदर कुमार और प्रो. पंकज श्रीवास्तव समेत कई विशेषज्ञ मौजूद रहे।
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