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    प्रभुजगन्नाथ ने सफेद वस्त्र धारण कर भक्तों को दिया दर्शन:पुजारी ने परवल के जूस का लगाया भोग,कल डोली में सवार होकर करेंगे नगर भ्रमण

    7 hours ago

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    धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी में भगवान जगन्नाथ का कपाट खुल गया है। 15वें दिन भक्तों को भगवान के दर्शन होने लगे। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को भक्तों द्वारा अत्यधिक जलाभिषेक करने के कारण भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ गए थे। 14 दिनों तक काढ़े का प्रतिदिन भोग लगाया गया। स्वास्थ्य लाभ के बाद आज 15वें दिन आषाढ़ मास के अमावस्या तिथि पर भगवान जगन्नाथ स्वस्थ हुए और प्रातः 5 बजे भक्तों को दर्शन दिए। मंदिर के प्रधान पुजारी राधेश्याम पांडे प्रातः काल भगवान का सफेद वस्त्र, सफेद फूलों से श्रृंगार करके पंचामृत का भोग लगाकर भव्य आरती की गई। आरती के पश्चात पंचामृत का प्रसाद भक्तों में वितरण किया गया. आज भगवान को परवल के जूस को भोग लगाया गया। मंदिर से कल भगवान की डोली निकलेगी। 16 से 18 जुलाई तक रथयात्रा मेला में भगवान रथ पर रथारूढ़ होकर भक्तों को दर्शन देंगे। देखें तस्वीर… यहां पर पढ़ें जगन्नाथ मंदिर और रथयात्रा मेले के इतिहास से जुड़ी खास जानकारियां… बात है 1765 के बाद की। पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर के मुख्य पुजारी ब्रह्मचारीजी की पुरी के राजा से विवाद हो गया। पुजारी ब्रह्मचारी पुरी को छोड़कर काशी आ गए। पुरी के जगन्नाथ मंदिर में रखी भगवान वासुदेव, भाई बलदाऊ और बहन सुभद्रा की प्रतिमा का प्रतिरूप लेकर काशी आए। यहां गंगा किनारे अस्सी घाट पर रहने लगे। पुरी के राजा को बाद में पश्चाताप हुआ तो फिर ब्रह्मचारी जी को बहंगी (भोग वाला प्रसाद) भिजवाना शुरू किया। हर सप्ताह यह बहंगी बनारस भेजी जाती थी। क्योंकि पुजारी पुरी के भगवान जगन्नाथ को चढ़े भोग के अलावा कोई भोजन नहीं ग्रहण करते थे। एक बार उड़ीसा में भयानक चक्रवात और बाढ़ के कारण बहंगी काशी नहीं पहुंच पाई। कई सप्ताह तक ब्रह्मचारी इंतजार करते-करते भूखे रहने लगे। जगन्नाथ मंदिर में लगे घंटे के अनुसार, मंदिर निर्माण की शुरुआत 1768 में हुई। एक दिन ब्रह्मचारी जी को सपना आया कि काशी में मेरा मंदिर बनवाओ। वहीं पर भोग लगवाओ और उसी का भोजन करो। पुजारी ने छत्तीसगढ़ के भोसले साम्राज्य से मंदिर बनाने मदद मांगी। छत्तीसगढ़ के राजा व्यंकोजी भोंसले ने काफी धन दिया। मंदिर और रथ यात्रा मेलों का आयोजन कराने के लिए राजा व्यंकोजी ने छत्तीसगढ़ का तखतपुर महाल जगन्नाथ जी को दान कर दिया। तखतपुर महाल से मिले रेवेन्यू द्वारा मंदिर का सारा प्रबंध होता था। उनके मंत्री पं. बेनीराम और कटक के दीवान विश्वंभर पंडित ने पूरी मदद की और 1790 में जगन्नाथ स्वामी, बलभद्र और सुभद्रा का मंदिर बनकर तैयार हो गया। 1857 की क्रांति के बाद मंदिर का राजस्व बंद पुरी जैसा ही नियम बनारस के जगन्नाथ मंदिर में लागू हुआ। 1857 के विद्रोह में भोसले साम्राज्य अंग्रेजों के अधीन हो गया। उनकी पूरी संपत्ति पर अवैध कब्जा कर लिया गया। इसके बाद से मंदिर को रेवेन्यू मिलना बंद हो गया। लगातार इस मंदिर की उपेक्षा होती रही। बहरहाल, क्रांति के बाद मंत्री बेनीराम को मंदिर का मैनेजर बनाया गया। तब से लेकर अब तक पं. बेनीराम की ही पीढ़ियां इस मंदिर में नियमित पूजा-पाठ करती चली आ रही है। 1805 में बेनीराम का निधन हो गया। इसके बाद उनके वंशज 221 सालों से इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। 1818 में पुरी की प्रदक्षिणा कर पुजारी ब्रह्मचारीजी काशी लौटे और यहां अस्सी घाट पर समाधि ले ली। मंदिर में रखे उनके वस्तुओं की पूजा आज भी होती है। नरसिम्हा, भक्त प्रह्ललाद और गरुण की भी प्रतिमा स्थापित इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा की तीन मूर्तियां हैं। देव पूजा करने की अनुष्ठान और प्रक्रिया पुरी के जगन्नाथ मंदिर जैसी ही है। इन मूर्तियों के साथ, लगभग 4 मीटर ऊंची प्रचंड नरसिम्हा और उनके भक्त प्रह्लाद की एक प्रतिमा भी है। बाहर गरुण देवता। मंदिर के परिसर को तीन भागों में बांटा गया है, जो कि 3 गेट से जुड़े हुए हैं। इस मंदिर का आकार आयताकार है और मुख्य शिखर की ऊंचाई लगभग 16 मीटर है। इस मंदिर के चार कोनों में, चार वैष्णव देवताओं की मूर्तियां हैं, जैसे कि कृष्ण, राम पंचायतन, कालियामर्दन हिंदू भगवान कृष्ण और लक्ष्मीनारायण के रूप में। यहां का पूरा परिसर किसी कॉरिडोर की तर्ज पर नजर आता है। मंदिर का पहला गेट मंदिर के पट से करीब 300 मीटर की दूरी पर होगा। मगर, पट से पहला गेट बिल्कुल सीधे-सीधे दिखता है।
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