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    पूर्वांचल विवि में ऑयस्टर मशरूम उत्पादन की नई तकनीक विकसित:शोध प्रतिष्ठित पत्रिका 'बायोरेसोर्स टेक्नोलॉजी रिपोर्ट्स' में प्रकाशित

    4 hours ago

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    वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर के बायोटेक्नोलॉजी विभाग ने ऑयस्टर मशरूम के उत्पादन को बढ़ाने के लिए एक नई और प्रभावी तकनीक विकसित की है। यह शोध एल्सेविएर की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका "बायोरेसोर्स टेक्नोलॉजी रिपोर्ट्स" में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ है, जिसका इम्पैक्ट फैक्टर चार से अधिक है। इस नई तकनीक में बरमूडा घास और प्रयुक्त मशरूम सब्सट्रेट (एसएमएस) के मिश्रण का उपयोग किया गया है। अध्ययन के अनुसार, इस मिश्रण से न केवल मशरूम की पैदावार बढ़ती है, बल्कि उसकी पोषण गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार होता है। यह शोध बायोटेक्नोलॉजी विभाग के शोधकर्ता रोशन लाल गौतम ने प्रो. राम नारायण के निर्देशन में किया है। शोध के दौरान, बरमूडा घास और एसएमएस को विभिन्न अनुपातों में मिलाकर मशरूम की खेती की गई। परिणामों से पता चला कि 80 प्रतिशत बरमूडा घास और 20 प्रतिशत एसएमएस का संयोजन सबसे प्रभावी था। इस संयोजन में मशरूम के माइसीलियम का विकास तेजी से हुआ और केवल 16 दिनों में पूरा माइसीलियल रन पूरा हो गया। इसी संयोजन में मशरूम की कुल उपज लगभग 1711 ग्राम दर्ज की गई, जिसकी जैविक दक्षता 336.4 प्रतिशत रही। यह अन्य सभी संयोजनों की तुलना में सर्वाधिक थी। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि एसएमएस के उपयोग से मशरूम की पोषण गुणवत्ता, जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और खनिज तत्वों में भी वृद्धि होती है। यह तकनीक मशरूम उत्पादन को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाने में सहायक हो सकती है। प्रयुक्त मशरूम सब्सट्रेट के पुनः उपयोग से कृषि अपशिष्ट को उपयोगी जैव उत्पाद में बदला जा सकता है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक किसानों और मशरूम उत्पादकों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी सिद्ध हो सकती है। यह भविष्य में मशरूम आधारित कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। शोधकर्ता रोशन लाल गौतम जौनपुर के निवासी हैं और वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग में कार्यरत हैं। उनका शोध मुख्य रूप से मशरूम प्रौद्योगिकी, लिग्नोसेलुलोजिक एंजाइम, जीन अभिव्यक्ति, सूक्ष्मविज्ञान और जैव रसायन जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित है।
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