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    सिद्धार्थनगर में घर में घुसकर मारपीट का आरोप:रास्ते-पानी निकासी को लेकर हुआ विवाद, 12 दिन बाद 19 पर केस

    3 hours ago

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    सिद्धार्थनगर के बांसी कोतवाली क्षेत्र के अड़गड़हा गांव में रास्ते और पानी निकासी के विवाद को लेकर हुई मारपीट की घटना ने एक बार फिर पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि 31 जुलाई को घर में घुसकर पूरे परिवार के साथ मारपीट की गई, महिलाओं को पीटा गया, मोटरसाइकिल तोड़ दी गई और जान से मारने की धमकी तक दी गई। इसके बावजूद पुलिस ने मुकदमा करीब 12 दिन बाद, 12 अगस्त को दर्ज किया। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि घटना 31 जुलाई को हुई थी तो पुलिस कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई? क्या पुलिस किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही थी? पीड़ित रामदास यादव निवासी अड़गड़हा की तहरीर के अनुसार गांव में काफी समय से रास्ते और पुरानी रंजिश को लेकर विवाद चला आ रहा था। आरोप है कि 31 जुलाई को कुछ लोगों ने पुलिया से निकलने वाले पानी का रास्ता रोक दिया। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो दोपहर करीब 12 बजे बड़ी संख्या में लोग लाठी-डंडों से लैस होकर उनके घर पहुंच गए। आरोपियों ने पहले गाली-गलौज की और फिर मारपीट शुरू कर दी। जान बचाने के लिए रामदास घर के अंदर चले गए, लेकिन आरोप है कि हमलावर घर में भी घुस गए और उनके साथ उनकी पत्नी विजयलक्ष्मी, पुत्र राजीव तथा राकेश की भी पिटाई की। इतना ही नहीं, घर के बाहर खड़ी मोटरसाइकिल में भी तोड़फोड़ की गई। शोर सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे और बीच-बचाव कराया। जाते समय आरोपियों ने पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप है। पुलिस ने इस मामले में 19 नामजद आरोपियों बाबूलाल, जगदीश, रामजीत, रामचंद्र, फूलचंद, अमित, संदीप, बसंती देवी, सुनील, बृजेश, रामवृक्ष, अशोक, आशीष, दिनेश, अरुण, लवकुश, राजकुमार, चंद्रिका और सीमा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। हालांकि मुकदमा दर्ज होने के समय को लेकर अब पुलिस सवालों के घेरे में है। दरअसल, सिद्धार्थनगर में जमीन, रास्ते और बंटवारे के विवाद अक्सर हिंसक रूप लेते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें शुरुआती शिकायतों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के कारण विवाद बढ़ता गया और अंततः किसी की जान चली गई। ऐसे मामलों में पुलिस की शुरुआती कार्रवाई हमेशा सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि समय पर हस्तक्षेप कई बार बड़ी घटनाओं को टाल सकता है। हाल ही में खेसरहा थाना क्षेत्र के चर्चित जमीनी विवाद के मामले में अदालत ने करीब तीन वर्ष बाद चार आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। उस मामले में भी विवाद की शुरुआत जमीन को लेकर मारपीट से हुई थी, लेकिन बाद में मामला हत्या तक पहुंच गया। अदालत के फैसले ने साफ कर दिया कि जमीन और रास्ते के विवाद को कभी भी मामूली नहीं माना जा सकता। शुरुआत में यदि सख्त कार्रवाई नहीं होती तो ऐसे विवाद खूनी संघर्ष में बदलने में देर नहीं लगती। सिद्धार्थनगर में इससे पहले भी खेत की मेड़, रास्ते, बंटवारे और कब्जे के विवादों को लेकर कई हत्याएं, गंभीर मारपीट और खूनी संघर्ष हो चुके हैं। अधिकांश मामलों में पहले दोनों पक्षों के बीच तनाव, शिकायतें और छोटे-छोटे विवाद सामने आए, लेकिन समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं होने से स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। यही वजह है कि अड़गड़हा की घटना में भी पुलिस की 12 दिन की देरी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि पीड़ित की शिकायत में घर में घुसकर मारपीट, महिलाओं पर हमला, संपत्ति में तोड़फोड़ और जान से मारने की धमकी जैसे गंभीर आरोप थे, तो मुकदमा दर्ज करने में लगभग 12 दिन क्यों लग गए? क्या शिकायत मिलने के बाद भी कार्रवाई टाली गई? क्या दोनों पक्षों के बीच समझौते का प्रयास होता रहा? या फिर पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया? इन सवालों का जवाब पुलिस को देना होगा। जमीनी और रास्ते के विवादों में हर देरी भविष्य के किसी बड़े अपराध की आशंका को बढ़ाती है। अड़गड़हा का मामला भी अब केवल 19 लोगों पर दर्ज मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुलिस की त्वरित कार्रवाई और कानून-व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़ा कर रहा है। क्योंकि यदि इन 12 दिनों के दौरान कोई बड़ी अनहोनी हो जाती, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होती?
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