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    शाहजहांपुर में लाट साहब पर बरसेंगे जूते-चप्पल:कोतवाल से सलामी लेकर रोड पर आएंगे लाट साहब, 3 हजार पुलिस बल तैनात

    1 hour ago

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    शाहजहांपुर में लाट साहब का पारंपरिक जुलूस आज कुछ ही देर में निकाला जाएगा। इस अनोखे जुलूस की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। बड़े लाट साहब को रामपुर से लाया गया है और कई दिनों से उनकी 'खातिरदारी' की जा रही थी। जुलूस शुरू होने से पहले लाट साहब मंदिर में दर्शन करेंगे। इसके बाद उन्हें सलामी के लिए चौक कोतवाली के अंदर ले जाया जाएगा, जहां चौक कोतवाल उन्हें सलामी देगी। सलामी के बाद लाट साहब का जुलूस अपने निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ेगा। इस जुलूस की सबसे खास बात यह है कि इसमें शामिल लोग और छतों पर मौजूद दर्शक लाट साहब पर रंग के साथ-साथ झाड़ू, जूते और चप्पलें बरसाकर उनका 'स्वागत' करते हैं। इतिहासकारों के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत शाहजहांपुर के अंतिम नवाब अब्दुल्ला खां ने वर्ष 1746-47 में की थी। उन्होंने किले पर दोबारा कब्जा करने के बाद किला मोहल्ला में एक रंग महल बनवाया था, जिसे अब रंग मेहला के नाम से जाना जाता है। नवाब अब्दुल्ला खां हर साल वहां होली खेलते थे और एक भव्य जुलूस निकालते थे, जिसमें हाथी-घोड़े और बैंड-बाजे शामिल होते थे। उनकी मृत्यु के बाद भी स्थानीय लोगों ने इस जुलूस को निकालना बंद नहीं किया। भारत में ब्रिटिश शासन आने के बाद अंग्रेजों ने होली पर नवाब के जुलूस पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि, लोगों ने जुलूस निकालना बंद नहीं किया, बल्कि इसके स्वरूप में बदलाव कर दिया। जो जुलूस पहले एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था, वह अब अंग्रेजों के विरोध का प्रतीक बन गया। इसका नाम 'नवाब साहब का जुलूस' से बदलकर 'लाट साहब का जुलूस' कर दिया गया। अंग्रेजों के अत्याचारों के कारण, 1947 के बाद इस जुलूस में 'हुड़दंगई' भी शामिल हो गई। लोग अंग्रेजों के प्रति अपने गुस्से को व्यक्त करने के लिए विभिन्न तरीके अपनाने लगे, जिसमें जूते-चप्पल फेंकना भी शामिल था। लाॅट साहब जुलूस को शांतिपूर्ण संपन्न कराने के लिए तीन हजार पुलिस बल लगाया गया है। इसमे पैरामिलिट्री फोर्स और पीएसी समेत स्थानीय पुलिस बल तैनात रहेगा। जुलूस मार्ग पर 50 से ज्यादा धार्मिक स्थलों को ढका गया है।
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