Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    शम्मी की अस्थियां डल झील में विसर्जित की गई थीं:लोग Yahoo का मालिक समझते थे, रणधीर ने पूछा था- अंकल, कंपनी कब खोली

    10 hours ago

    1

    0

    शम्मी कपूर को ‘याहू’ की गूंज, बेफिक्र अंदाज और खुलकर नाचने वाले हीरो के तौर पर पूरी पीढ़ी ने याद किया। लेकिन उनके जीवन के कई किस्से स्टारडम से भी ज्यादा दिलचस्प हैं। एक दौर में उनकी ‘Yahoo’ पहचान इतनी मशहूर हो गई थी कि लोग उन्हें याहू कंपनी का मालिक समझने लगे थे। परिवार में भी कन्फ्यूजन था। रणधीर कपूर ने उनसे पूछ लिया था- “अंकल, आपने कंपनी खोली और बताया भी नहीं?” शम्मी कपूर की 15वीं डेथ एनिवर्सरी पर रजा मुराद और अरुण बख्शी ने उनसे जुड़ी यादें साझा कीं। जिस स्टार की फिल्म देखने के लिए घंटों लाइन लगती थी शम्मी कपूर के स्टारडम को समझने के लिए रजा मुराद की कहानी काफी है। जिस अभिनेता के साथ बाद में उन्होंने स्क्रीन शेयर की, कभी उसी की फिल्म देखने के लिए उन्हें घंटों एडवांस बुकिंग की लाइन में खड़ा होना पड़ता था। रजा मुराद बताते हैं कि शम्मी कपूर उनके पसंदीदा सितारों में थे। ‘जंगली’, ‘जानवर’, ‘ब्लफ मास्टर’, ‘राजकुमार’ और ‘सच्चाई’ जैसी फिल्मों के लिए दर्शकों में जबरदस्त क्रेज रहता था। करंट बुकिंग में टिकट मिलना मुश्किल होता था। इसलिए एडवांस बुकिंग के लिए घंटों लाइन लगानी पड़ती थी। नकल नहीं की, अपना अंदाज बनाया शम्मी कपूर की खासियत सिर्फ उनकी लोकप्रियता नहीं थी। उन्होंने किसी दूसरे अभिनेता की नकल करके अपना स्टाइल नहीं बनाया। उनकी अपनी बॉडी लैंग्वेज, ऊर्जा और आत्मविश्वास था। यही वजह थी कि भीड़ में भी वह तुरंत अलग नजर आते थे। फैन से को-स्टार तक का सफर वक्त बदला और वही रजा मुराद फिल्म ‘प्रेम रोग’ के सेट पर शम्मी कपूर के साथ खड़े थे, जिनकी फिल्में देखने के लिए वह कभी लाइन में लगा करते थे। रजा के लिए यह सपने के सच होने जैसा था। लेकिन शम्मी कपूर ने उन्हें कभी छोटा महसूस नहीं कराया। जूनियर कलाकार होने के बावजूद वह उनसे सहजता और बराबरी के भाव से पेश आते थे। रजा मुराद कहते हैं- सेट पर वह प्रैंक और मजाक करते रहते थे। कई बार किसी से आधी बात कहकर अचानक चुप हो जाते। सामने वाला सोचता रह जाता कि आखिर बात क्या है। फिर कुछ देर बाद शम्मी कपूर हंसते हुए बताते कि वह मजाक कर रहे थे। कैमरे का एंगल तक याद रहता था उनके भीतर का बच्चा उम्र के साथ बड़ा नहीं हुआ था। कैमरे के सामने भी वह सजग रहते थे। उन्हें पता रहता था कि कैमरा किस एंगल से उन्हें देख रहा है और फ्रेम में उनका चेहरा किस तरह नजर आएगा। अच्छा खाना उन्हें पसंद था और दोस्तों को खिलाना भी। घर पर दोस्तों के लिए दावतें करना उनके स्वभाव का हिस्सा था। स्टारडम के बावजूद जिंदगी को भरपूर जीने का यह अंदाज आखिरी दौर तक बना रहा। कश्मीर से था खास रिश्ता शम्मी कपूर और कश्मीर का रिश्ता हिंदी सिनेमा की यादों में खास जगह रखता है। ‘जंगली’, ‘कश्मीर की कली’ और ‘जानवर’ जैसी फिल्मों ने कश्मीर की खूबसूरती देशभर के दर्शकों तक पहुंचाई। ‘ये चांद सा रोशन चेहरा’, ‘कश्मीर की कली हूं मैं’ और ‘मेरे यार शब्बा खैर’ जैसे गीतों में नजर आईं वादियां और शम्मी कपूर का मस्तमौला अंदाज दर्शकों के दिल में बस गया। कश्मीर के पर्यटन में भी योगदान रजा मुराद मानते हैं कि कश्मीर के पर्यटन को लोकप्रिय बनाने में शम्मी कपूर की फिल्मों का बड़ा योगदान था। उनका कहना था कि शम्मी कपूर के नाम पर वहां कोई सड़क, बगीचा या मोहल्ला होना चाहिए। वह चाहते थे कि कश्मीर एयरपोर्ट का नाम भी शम्मी कपूर के नाम पर रखा जाता तो यह उनके योगदान का शानदार सम्मान होता। रजा के लिए शम्मी कपूर का पूरा व्यक्तित्व एक ही बात में समाया था- या तो सबसे अच्छे बनो या सबसे अलग। शम्मी कपूर निश्चित रूप से सबसे अलग थे। गीता बाली से मुलाकात और चार महीने का प्यार शम्मी कपूर की निजी जिंदगी का खूबसूरत अध्याय अभिनेत्री गीता बाली से जुड़ा था। दोनों की मुलाकात फिल्मी माहौल में हुई। ‘रंगीली रातें’ की शूटिंग के दौरान दोनों करीब आए। शम्मी कपूर ने गीता बाली के सामने शादी का प्रस्ताव रखा, लेकिन उन्होंने तुरंत हां नहीं की। करीब चार महीने तक दोनों इस बारे में बातचीत करते रहे। फिर एक रात गीता बाली ने कहा कि अगर शादी करनी है तो अभी करनी है। आधी रात मंदिर पहुंचे, पुजारी ने कहा- भगवान सो चुके हैं दोनों अपने दोस्त जॉनी वॉकर और निर्माता हरि वालिया की मदद से बाणगंगा मंदिर पहुंचे। रात काफी हो चुकी थी। पुजारी ने उनसे कहा कि भगवान सो चुके हैं, सुबह करीब चार बजे आइए। दोनों लौटे और सुबह फिर मंदिर पहुंचे। इसके बाद शादी हुई। लिपस्टिक से भरी मांग इस शादी की सादगी भी शम्मी-गीता के रिश्ते जैसी थी। गीता बाली के पास सिंदूर नहीं था। उन्होंने पर्स से लिपस्टिक निकाली और शम्मी कपूर से कहा कि उसी से उनकी मांग भर दें। 1955 में हुई इस शादी से दोनों के दो बच्चे हुए। करीब दस साल बाद गीता बाली की असमय मौत ने इस रिश्ते को हमेशा के लिए तोड़ दिया। गीता के जाने के बाद टूट गए थे शम्मी 1965 में गीता बाली के निधन के बाद शम्मी कपूर की जिंदगी का मुश्किल दौर शुरू हुआ। नीला देवी ने विक्की लालवानी को दिए इंटरव्यू में बताया था कि वह इस सदमे से लंबे समय तक बाहर नहीं निकल पाए। करीब छह महीने तक वह राज कपूर के घर रहे। कृष्णा कपूर ने उनके बच्चों की देखभाल में मदद की। दर्द में शराब और सिगरेट का सहारा नीला देवी के मुताबिक, इस दौर में शम्मी कपूर ने शराब और सिगरेट का सहारा लिया। एक समय वह दिन में करीब 100 सिगरेट तक पीते थे और काफी शराब लेते थे। गीता बाली की याद उनके जीवन से कभी अलग नहीं हुई। 21 दिन गीता की याद में शराब से दूरी नीला देवी ने बताया कि हर साल 1 जनवरी से 21 जनवरी तक शम्मी कपूर शराब को हाथ नहीं लगाते थे। 21 जनवरी गीता बाली की पुण्यतिथि थी। इन 21 दिनों का संयम उनके लिए गीता को याद करने का तरीका था। धीरे-धीरे उन्होंने शराब कम की और बाद में लगभग छोड़ दी। आधी रात फोन और चार घंटे की बातचीत गीता बाली के निधन के बाद शम्मी कपूर की जिंदगी में नीला देवी आईं। इस रिश्ते की शुरुआत भी शम्मी कपूर वाले अंदाज में हुई। एक रात शम्मी कपूर ने नीला देवी को फोन किया। पहले उनकी बहन ने फोन उठाया और आवाज पहचानकर फोन रख दिया। शम्मी कपूर ने कहा कि उन्हें अभी नीला से बात करनी है। इसके बाद करीब चार-पांच घंटे दोनों की बातचीत हुई। एक रात में सुनाई पूरी जिंदगी की कहानी शम्मी कपूर ने नीला देवी को अपने जीवन की कहानी सुनाई- बचपन, परिवार, रिश्ते, गीता बाली, बच्चे और गीता के निधन के बाद की जिंदगी तक। उन्होंने अपनी जिंदगी की अच्छी और बुरी बातें बिना छिपाए बताईं। फिर साफ कहा कि वह उनसे शादी करना चाहते हैं और अगले दिन आकर उन्हें बाणगंगा ले जाएंगे। नीला देवी ने कहा कि शादी परिवार की मौजूदगी में ही होगी। शम्मी कपूर इसके लिए तैयार हो गए। कृष्णा कपूर पहले से नीला देवी को पसंद करती थीं और उन्होंने शम्मी कपूर को उनसे शादी करने की सलाह दी थी। 27 जनवरी 1969 को अचानक हुई शादी 27 जनवरी 1969 को शम्मी कपूर और नीला देवी की शादी हो गई। तैयारी इतनी अचानक हुई कि नीला देवी के कपड़े बाद में मंगवाए गए। शुरुआत में कृष्णा कपूर को लगा कि शम्मी मजाक कर रहे हैं। लेकिन जब उन्होंने साफ कर दिया कि वह सचमुच शादी करने जा रहे हैं, तो परिवार तैयार हुआ। कपूर परिवार में नया रिश्ता शादी के कुछ ही दिन बाद रितु नंदा की बड़ी शादी थी। इसलिए कपूर परिवार में शम्मी और नीला की शादी भी चर्चा में रही। नीला देवी के लिए कपूर परिवार में प्रवेश करना आसान नहीं था। जो लोग कल तक उन्हें दोस्त या दूसरे रिश्ते से जानते थे, अब कोई भाभीजी, कोई मामीजी और कोई चाचीजी कह रहा था। लेकिन सबसे अहम था शम्मी कपूर के बच्चों का उन्हें स्वीकार करना। गीता की अंगूठी ने बढ़ाया अपनापन शादी के तीसरे दिन शम्मी कपूर ने गीता बाली की अंगूठी नीला देवी को दी। उस पर हीरे के साथ ‘S’ लिखा था। नीला देवी ने इसे गीता बाली का प्रसाद मानकर स्वीकार किया। इस घटना से कंचन के मन में भी नीला देवी के लिए अपनापन बढ़ा। रिश्ता दो महीने भी नहीं चलेगा, लोगों ने कहा था शम्मी कपूर और नीला देवी की शादी को लेकर शुरुआत में कई लोगों को भरोसा नहीं था। पत्रकारों और आसपास के लोगों में चर्चा थी कि यह रिश्ता दो महीने भी नहीं टिकेगा। लेकिन शम्मी कपूर और नीला देवी ने यह धारणा गलत साबित कर दी। उनका साथ चार दशक से ज्यादा चला। पर्दे पर मस्त, असल जिंदगी में गुस्सैल नीला देवी बताती हैं कि पर्दे पर हमेशा मस्ती करते नजर आने वाले शम्मी कपूर असल जिंदगी में शर्मीले भी थे। उनका गुस्सा तेज था, हालांकि ज्यादा देर नहीं रहता था। शराब पीने के बाद कभी-कभी उनका गुस्सा बढ़ जाता। अगले दिन पूरी घटना याद नहीं रहती तो वह नीला देवी से पूछते कि पिछली रात क्या हुआ था। सब सुनने के बाद उन्हें अपने व्यवहार पर अफसोस होता और वह माफी मांगते। ‘याहू’ से ऐसा रिश्ता कि लोग मालिक समझ बैठे शम्मी कपूर के नाम के साथ ‘याहू’ इतना गहराई से जुड़ गया था कि एक दौर में लोग सचमुच उन्हें ‘याहू’ कंपनी का मालिक समझने लगे थे। शम्मी कपूर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके भतीजे रणधीर कपूर ने भी उनसे पूछ लिया था कि उन्होंने कभी क्यों नहीं बताया कि ‘याहू’ उनकी कंपनी है। शम्मी ने मजाक में जवाब दिया था कि अगर ‘याहू’ उनकी कंपनी होती तो वह भारत में नहीं बैठे होते, अमेरिका में होते। रणधीर कपूर भी हो गए थे कन्फ्यूज यह किस्सा बताता है कि शम्मी कपूर की ‘याहू’ पहचान कितनी मजबूत हो चुकी थी। उनकी फिल्म ‘जंगली’ का ‘याहू’ गीत और उनका उछलता-कूदता अंदाज इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग इस शब्द को उनकी पहचान मानने लगे। याहू के भारत लॉन्च के समय कंपनी के सह-संस्थापक जेरी यांग भारत आए थे। शम्मी कपूर को भी कार्यक्रम में बुलाया गया। वहां उनके पहुंचते ही मशहूर ‘याहू’ गीत बजाया गया। डांस में स्टेप नहीं, बस संगीत का साथ शम्मी कपूर का डांस देखकर लगता था कि वह कोरियोग्राफी नहीं कर रहे, बल्कि संगीत को जी रहे हैं। उनका डांस काफी हद तक एक्सटेम्पोर होता था। तय स्टेप्स को हूबहू दोहराने के बजाय वह संगीत के साथ शरीर को स्वाभाविक रूप से चलने देते थे। उस दौर में हीरो का इस तरह खुलकर नाचना आम नहीं था। शम्मी कपूर ने यह सोच बदल दी। डांस को अभिनय का हिस्सा बनाया उनके लिए डांस सिर्फ गाने के बीच का हिस्सा नहीं था। वह अभिनय का हिस्सा था। उनकी खासियत यह भी थी कि वह किसी दूसरे अभिनेता को फॉलो नहीं करते थे। यही वजह थी कि उनके डांस को देखकर दर्शक तुरंत पहचान जाते थे कि यह शम्मी कपूर का अंदाज है। ‘बंटवारा’ के सेट पर जूनियर से मांगी माफी अरुण बक्शी ने फिल्म ‘बंटवारा’ की शूटिंग का किस्सा सुनाया, जो शम्मी कपूर की विनम्रता दिखाता है। शूटिंग के दौरान डायरेक्टर जेपी दत्ता शम्मी कपूर के साथ अरुण बक्शी का लंबा सीन फिल्मा रहे थे। शम्मी कपूर से लगातार रीटेक हो रहे थे। नए कलाकार को लग रहा था गलती उसकी है अरुण बक्शी उस समय नए कलाकार थे। उन्हें डर था कि उनकी वजह से शम्मी कपूर को परेशानी हो रही होगी। हर रीटेक के बाद वह दूर जाकर अपनी लाइनें दोहराने लगते। आखिरकार शॉट ओके हुआ। इसके बाद शम्मी कपूर खुद उनके पास पहुंचे और कहा- “अरुण, सॉरी यार।” इतने बड़े स्टार की माफी भूल नहीं पाए अरुण इतने बड़े स्टार का एक नए कलाकार से माफी मांगना अरुण बक्शी के लिए याद रहने वाला पल बन गया। यह किस्सा बताता है कि स्टारडम कितना भी बड़ा हो, शम्मी कपूर के लिए सामने वाले कलाकार की इज्जत उससे बड़ी थी। सेट से विमान तक जारी रहती थी महफिल ‘बंटवारा’ की शूटिंग के दौरान शम्मी कपूर, धर्मेंद्र और दूसरे कलाकारों के साथ बैडमिंटन खेलने का आनंद लेते थे। शूटिंग खत्म होने के बाद वापसी की फ्लाइट में भी उनकी मस्ती खत्म नहीं हुई। उस दौर में विमान में शराब की अनुमति थी। कलाकार अपने-अपने ब्रांड लेकर बैठे थे। फ्लाइट में जम गई गानों की महफिल विनोद खन्ना ने गाना शुरू किया और शम्मी कपूर भी साथ गाने लगे। अरुण बक्शी ने भी आलाप लगाया। देखते ही देखते विमान में महफिल जम गई। कुछ विदेशी यात्री भी इस माहौल का आनंद लेने लगे। यह किस्सा बताता है कि शम्मी कपूर के लिए शूटिंग के बाद भी जिंदगी एक उत्सव थी। फिल्म स्टार से इंटरनेट के शुरुआती दीवानों तक शम्मी कपूर की जिंदगी का एक पहलू उन्हें अपने दौर के बाकी सितारों से अलग बनाता है- टेक्नोलॉजी के प्रति उनका जुनून। जब भारत में इंटरनेट नया था और ज्यादातर लोग कंप्यूटर से परिचित भी नहीं थे, तब शम्मी कपूर कंप्यूटर सीख रहे थे। मैकिंटोश से बदली जिंदगी उन्होंने शुरुआती दौर में मैकिंटोश कंप्यूटर लिया। तकनीक को वह सिर्फ इस्तेमाल नहीं करना चाहते थे, बल्कि समझने की कोशिश करते थे। नीला देवी के मुताबिक, कंप्यूटर ने उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव किया। इसी दौर में उन्होंने सिगरेट भी छोड़ दी। एक तरफ वह पुरानी पीढ़ी के लोकप्रिय फिल्म स्टार थे, दूसरी तरफ नई डिजिटल दुनिया को अपनाने वाले शुरुआती लोगों में शामिल थे। बीमारी ने शरीर कमजोर किया, हौसला नहीं साल 2003 में शम्मी कपूर के फेफड़ों की हालत गंभीर हो गई। नीला देवी के मुताबिक, वह करीब एक महीने तक ब्रीच कैंडी अस्पताल में वेंटिलेटर पर रहे। इलाज के दौरान स्टेरॉयड और एंटीबायोटिक्स के असर से उनकी किडनी भी प्रभावित हुई और डायलिसिस शुरू हुआ। डायलिसिस के बावजूद घूमना नहीं छोड़ा रजा मुराद ने बताया कि दोनों किडनियों की समस्या के बावजूद शम्मी कपूर के चेहरे से मुस्कान गायब नहीं हुई थी। उनका रवैया था- इलाज करवाना है तो करवाना है और जिंदगी जीनी है तो जीनी है। डायलिसिस के बावजूद उन्होंने दुनिया घूमना नहीं छोड़ा। नीला देवी के साथ उन्होंने स्विट्जरलैंड, लंदन और न्यूयॉर्क तक यात्राएं कीं। अस्पताल के अलावा जिंदगी भी जरूरी थी बाद में जब डायलिसिस सप्ताह में तीन बार होने लगा तो कमजोरी बढ़ गई और यात्राएं मुश्किल हो गईं। लेकिन अस्पताल के अलावा बाकी दिनों में बाहर खाना उनके जीवन का हिस्सा बना रहा। कई वर्षों तक वह नीला देवी को सुबह तैयार होने के बाद किसी अच्छे होटल या रेस्टोरेंट में खाना खिलाने ले जाते थे। ड्राइविंग थी आजादी का अहसास शम्मी कपूर को ड्राइविंग का जबरदस्त शौक था। एक दिन उन्होंने नीला देवी से कहा कि वह सिर्फ कॉफी पीने जा रहे हैं और जल्दी लौट आएंगे। लेकिन वह काफी देर तक नहीं लौटे। फोन करने पर पता चला कि वह खुद गाड़ी चलाकर खंडाला पहुंच गए हैं। ‘ड्राइव नहीं कर सकता तो जीने का क्या फायदा’ उनके लिए ड्राइविंग सिर्फ शौक नहीं, बल्कि आजादी का अहसास थी। जब बीमारी के कारण वह खुद गाड़ी चलाने की स्थिति में नहीं रहे तो उन्होंने नीला देवी से कहा- “जब मैं ड्राइव नहीं कर सकता तो जीने का क्या फायदा?” नीला देवी ने उन्हें समझाया। यह वाक्य उनके जीवन के उस पहलू को सामने लाता है, जिसमें स्वतंत्रता और सक्रिय रहना उनके लिए जरूरी था। व्हीलचेयर आई, लेकिन जिंदगी नहीं रुकी व्हीलचेयर पर आने के बाद भी उन्होंने खुद को घर में कैद नहीं किया। लोगों से मिलते, बाहर जाते और अस्पताल में दूसरे मरीजों से मिलने की कोशिश करते। बीमारी उनके शरीर को रोक रही थी, लेकिन जिंदगी जीने की उनकी इच्छा को नहीं। बीमारी के बीच आध्यात्मिक बदलाव शम्मी कपूर शुरू में गुरु और आध्यात्मिकता को लेकर बहुत गंभीर नहीं थे। नीला देवी की मां ने उन्हें महावतार बाबाजी की तस्वीर दी थी और ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करने को कहा था। वह इसे सम्मान के तौर पर करते थे। करीब दो साल बाद उनकी मुलाकात गुरुजी से हुई। नीला देवी के मुताबिक, इस मुलाकात के बाद उनके जीवन में आध्यात्मिक बदलाव आया। भजन में हारमोनियम बजाते थे शम्मी परिवार गुरुजी के साथ बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, द्वारका और सोमनाथ जैसी यात्राओं पर गया। भजन-कीर्तन में शम्मी कपूर हारमोनियम बजाकर गाते थे। गुरुजी ने उन्हें फिल्मों या शराब से दूर रहने का आदेश नहीं दिया। नीला देवी के अनुसार, उन्होंने सिर्फ प्यार और आध्यात्मिक मार्ग दिखाया। यही बात शम्मी कपूर को सबसे ज्यादा प्रभावित कर गई। हीरो से कैरेक्टर एक्टर बनने में नहीं झिझके उम्र बढ़ने के साथ जब शम्मी कपूर को चरित्र भूमिकाएं मिलने लगीं तो कुछ लोगों ने कहा कि इतने बड़े स्टार को ऐसे रोल नहीं करने चाहिए। शम्मी कपूर ने नीला देवी से सलाह ली। उनका जवाब था- “आप अभिनेता हैं, अभिनेता कोई भी किरदार कर सकता है।” शम्मी कपूर को यह बात पसंद आई। स्टारडम से बड़ा था अभिनय उन्होंने चरित्र भूमिकाएं स्वीकार करना जारी रखा। उनका मानना था कि घर बैठकर सिर्फ शराब पीना और खाना उनकी जिंदगी नहीं हो सकती। अगर काम मिल रहा है तो काम करना चाहिए। यही वजह थी कि उम्र और बीमारी के बावजूद उन्होंने खुद को काम से अलग नहीं किया। अस्पताल जाते हुए भी गाना नहीं छोड़ा नीला देवी के मुताबिक, एक बार क्रिसमस के दौरान पुणे में शम्मी कपूर की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और अगले दिन एंबुलेंस से मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल लाया गया। अस्पताल पहुंचने और ICU की ओर जाते समय भी वह गाना गाने लगे। बीमारी शरीर तक पहुंची, कलाकार तक नहीं यह वही शम्मी कपूर थे, जिन्होंने पूरी जिंदगी दर्शकों को हंसाया, नचाया और अपनी ऊर्जा से भर दिया था। बीमारी ने उनके शरीर को कमजोर जरूर किया, लेकिन उनके भीतर के कलाकार को खत्म नहीं कर पाई। उनकी जिंदगी का यही सबसे बड़ा सबक था- हालात कितने भी मुश्किल हों, जिंदगी को जीना नहीं छोड़ना चाहिए। कश्मीर में हुई अंतिम इच्छा पूरी कश्मीर शम्मी कपूर के दिल के करीब था। उनकी इच्छा थी कि निधन के बाद उनकी अस्थियां डल झील में विसर्जित की जाएं। उनकी यह इच्छा पूरी की गई। जिस कलाकार ने ‘जंगली’ से कश्मीर की वादियों में अपना अलग रंग बिखेरा और ‘कश्मीर की कली’ के जरिए घाटी की खूबसूरती को देशभर के दर्शकों की कल्पना का हिस्सा बनाया, उसकी अंतिम विदाई भी उसी कश्मीर की झील से जुड़ी। ____________________________________ यह खबर भी पढ़ें.. किशोर कुमार ने कार दफनाकर कई दिन शोक मनाया:'आनंद' में उन्हें हीरो लेना चाहते थे ऋषिकेश मुखर्जी, सिर मुंडवाकर बोले थे- अब क्या करोगे हिंदी सिनेमा के सबसे बहुमुखी कलाकारों में किशोर कुमार का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। उन्होंने अभिनय, संगीत, निर्देशन और फिल्म निर्माण किया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी आवाज बनी। चार दशक तक उन्होंने मोहम्मद रफी, मुकेश और मन्ना डे जैसे दिग्गजों के बीच अपनी अलग जगह बनाई।पूरी खबर पढ़ें..
    Click here to Read more
    Prev Article
    नारनौल के मोहित का अनिल कपूर के शो में चयन:एक मिनट के वीडियो से एंट्री हुई; 13 में से 11 सवालों के सही जवाब देकर सेलेक्ट हुए
    Next Article
    गश्मीर महाजनी बोले-गर्लफ्रेंड दूसरी आ जाएगी, एक्टिंग नहीं छोड़ सकता:एरिका फर्नांडिस बोलीं- मैंने हमेशा करियर चुना; '108 बेस हॉस्पिटल: उरी' घायल जवानों की कहानी

    Related मनोरंजन Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment