Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    दुधवा में बाघ के हमले से मादा गैंडे की मौत:वन विभाग की टीम पहुंची तो उसके ऊपर बैठा था बाघ

    2 hours ago

    1

    0

    लखीमपुर खीरी के दुधवा टाइगर रिजर्व में एक मादा गैंडे की बाघ के हमले से मौत हो गई। यह घटना दक्षिण सोनारीपुर रेंज स्थित पहले गैंडा पुनर्वास केंद्र में हुई। मृत गैंडे की पहचान 'राजेश्वरी' के रूप में की गई है। यह घटना बुधवार सुबह उस समय सामने आई जब गैंडा मॉनिटरिंग टीम हाथियों पर सवार होकर नियमित गश्त कर रही थी। अमहा ताल क्षेत्र में टीम ने एक बाघ को पानी में आधे डूबे गैंडे के ऊपर बैठा देखा। टीम ने तुरंत तस्वीरें लीं और शोर मचाकर बाघ को वहां से भगाया। वन विभाग की टीम ने सावधानीपूर्वक गैंडे का निरीक्षण किया। प्रारंभिक जांच में गैंडा गंभीर रूप से घायल पाया गया। विस्तृत परीक्षण के बाद पुष्टि हुई कि गैंडे की मौत बाघ के हमले के कारण हुई थी। दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड निदेशक डॉ. एच. राजा मोहन ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी यह स्पष्ट हो गया है कि मादा गैंडे की मृत्यु बाघ के हमले के कारण ही हुई है। उल्लेखनीय है कि दक्षिण सोनारीपुर रेंज में यह पहला गैंडा पुनर्वास केंद्र है, जहाँ गैंडों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए विशेष निगरानी की जाती है। इस घटना के बाद वन विभाग ने क्षेत्र में गश्त और निगरानी बढ़ा दी है। दुधवा टाइगर रिजर्व में वर्ष 1984-85 में शुरू की गई दुधवा गैंडा पुनर्वास योजना आज देश की सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण परियोजनाओं में शुमार हो चुकी है। असम से लाए गए मात्र पांच एक सींग वाले गैंडों से शुरू हुई यह पहल अब 40 से अधिक, लगभग 42 गैंडों की मजबूत आबादी तक पहुँच चुकी है। विलुप्त प्रजाति को मिला नया जीवन करीब 100-150 वर्ष पूर्व तराई क्षेत्र से एक सींग वाले भारतीय गैंडे पूरी तरह लुप्त हो चुके थे। वर्ष 1984 में इन्हें पुनः बसाने के उद्देश्य से असम से गैंडों को दुधवा लाया गया। शुरुआती दौर में दक्षिण सोनारीपुर रेंज के 27 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (RRA-1) में उन्हें सुरक्षित रखा गया, जहाँ कड़ी निगरानी और प्राकृतिक वातावरण में उनका संरक्षण किया गया। गैंडों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अब दो नए पुनर्वास क्षेत्र—RRA-3 और RRA-4—विकसित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों के निर्माण व प्रबंधन के लिए प्रदेश सरकार ने लगभग 1.5 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक घासभूमि, जलस्रोत, सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जा रहा है। फ्री-रेंज में छोड़े गए गैंडे वन विभाग के अनुसार नवंबर-दिसंबर 2024 में चार गैंडों को बाड़े से निकालकर खुले जंगल (फ्री-रेंज) में छोड़ा गया है। इससे उनके प्राकृतिक व्यवहार और प्रजनन दर में वृद्धि की संभावना बढ़ी है। जैव विविधता को मिला संबल विशेषज्ञों का मानना है कि गैंडे घास के मैदानों के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी मौजूदगी से दुधवा का पारिस्थितिकी तंत्र और सुदृढ़ हुआ है। साथ ही इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिला है, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं। संरक्षण की मिसाल वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार दुधवा की यह योजना देशभर के अन्य अभयारण्यों के लिए एक मॉडल बन चुकी है। पांच गैंडों से शुरू हुई यह यात्रा आज 42 के करीब पहुँचकर यह साबित कर रही है कि सतत प्रयास और प्रभावी प्रबंधन से विलुप्त प्रजातियों को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
    Click here to Read more
    Prev Article
    दांत से सिलेंडर उठाकर हुरियारा नाचा, VIDEO:डिप्टी सीएम का सिंगर अवतार; बॉलीवुड एक्ट्रेस भी थिरकीं; यूपी में होली के रंग
    Next Article
    कल की बड़ी खबरें, क्योंकि आज अखबार नहीं है:कौशांबी में अबीर-गुलाल से सराबोर शहर, पुलिस ने 4 दिन में 299 लीटर शराब पकड़ा

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment