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    वाराणसी में 6 हजार महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर:गाय के गोबर-गोमूत्र से उत्पाद बनाकर जी रहीं सम्मानजनक जीवन, गौमाता की भी हो रही रक्षा

    1 hour ago

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    जब इरादे फौलादी हों और लक्ष्य समाज का कल्याण, तो साधारण से दिखने वाले संसाधन भी असाधारण परिवर्तन का जरिया बन जाते हैं। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के शिवपुर थाना क्षेत्र स्थित तरना यमुना नगर कॉलोनी की रहने वाली 50 वर्षीय रीता तिवारी ने इस बात को सच कर दिखाया है। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के पावन अवसर पर, रीता तिवारी की कहानी उन करोड़ों महिलाओं के लिए एक मशाल है जो अपनी पहचान बनाने और आत्मनिर्भर होने का सपना देखती हैं। रीता तिवारी ने गाय के गोबर को सिर्फ 'अपशिष्ट' नहीं, बल्कि 'अर्थव्यवस्था' का आधार बनाया है। आज उनके मार्गदर्शन में वाराणसी की हजारों महिलाएं गोबर से धूपबत्ती, दीपक, मूर्तियां और गमले बनाकर न केवल अपने घर का चूल्हा जला रही हैं, बल्कि समाज में सम्मान के साथ सिर उठाकर जी रही हैं। संकट काल में उपजा 'सशक्तिकरण' का विचार रीता तिवारी बताती हैं कि वे पिछले दो दशकों से गौ-सेवा और सामाजिक कार्यों से जुड़ी रही हैं। लेकिन, उनके जीवन और कार्यशैली में बड़ा बदलाव कोरोना महामारी के दौरान आए लॉकडाउन में आया। रीता बताती हैं कि जब वे गरीबों और दलित बस्तियों में भोजन वितरण के लिए जाती थीं, तो उन्होंने वहां की महिलाओं की बेबसी को बहुत करीब से देखा। आर्थिक तंगी के कारण वे महिलाएं अपने बच्चों की बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष कर रही थीं। यहीं से रीता के मन में विचार आया कि इन महिलाओं को केवल दान नहीं, बल्कि काम देने की जरूरत है। उन्होंने गौ विज्ञान और अनुसंधान केंद्र, नागपुर से संपर्क किया और गाय के गोबर से मूल्यवान उत्पाद बनाने की बारीकियां सीखीं। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने धूप स्टिक, मूर्तियां और गमले बनाने के सांचे मंगवाए और अपने मिशन की शुरुआत कर दी। शुरुआत छोटी थी, लेकिन उद्देश्य बड़ा था। धीरे-धीरे महिलाएं जुड़ती गईं और आज यह एक कारवां बन चुका है। वर्तमान में वाराणसी के हरहुआ, चोलापुर, चिरईगांव, बड़ागांव, पिंडरा, सेवापुरी, आराजी लाइन और काशी विद्यापीठ जैसे सभी आठों ब्लॉकों की लगभग 6 हजार महिलाएं इस संस्था से जुड़ चुकी हैं।
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