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    1.80 करोड़ की ठगी में 55 से ज्यादा खाते शामिल:35 खाते अभी भी रडार पर, 24 लाख की रकम तीसरी-चौथी लेयर में फंसी

    9 hours ago

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    पेपर मील निदेशक के खाते से उड़ाई गई 1.80 करोड़ रुपये की रकम को साइबर अपराधियों ने 55 से ज्यादा खातों (म्यूल अकाउंट) में ट्रांसफर किया था। यह खुलासा साइबर थाना पुलिस की अभी तक की कार्रवाई में सामने आया है। त्वरित कार्रवाई होने की वजह से 24 खातों में मौजूद 1.55 करोड़ की रकम फ्रीज करा दी गई जो कारोबारी को मिल चुकी है। अब 30 से ज्यादा खाते ऐसे हैं, जिनमें कुछ रकम अभी भी मौजूद है। इन खातों तक पहुंचने की तैयारी है। सभी खाते बिहार और असम के बताए जा रहे हैं। साइबर ठगों ने जिस टेक्निक को अपनाया वह साइबर की दुनिया में बॉस स्कैम के नाम से जानी जाती है। देशभर में काफी मामले इसके सामने आ चुके हैं लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के बाद मेरठ में यह दूसरा मामला सामने आया है। बॉस स्कैम में कारोबारी या कंपनी के अधिकारी को सीधे निशाना बनाने के बजाय उसके कर्मचारी के मोबाइल पर कब्जा कर बॉस बनकर करोड़ों रुपये ट्रांसफर करा लिए जाते हैं। मेरठ के मवाना रोड डिफेंस कॉलोनी निवासी पेपर मील निदेशक प्रज्जवल अग्रवाल भी इसी का शिकार हुए। कोर्ट के आदेश पर 1.55 करोड़ रुपये रिलीज साइबर थाना पुलिस ने ठगी की रकम में से 1.55 करोड़ रुपये 22 से ज्यादा बैंक खातों में फ्रीज करा दिए थे। हाल ही में कोर्ट के आदेश पर यह रकम रिलीज कराई गई है। अब साइबर टीम का पूरा फोकस 24 लाख रुपये पर है, जो 35 अलग-अलग बैंक खातों में फ्रीज हैं। खास बात यह है कि यह रकम तीसरी और चौथी लेयर में पहुंच चुकी है। टीम इन खातों की कड़ियां जोड़ते हुए रकम तक पहुंचने और इसमें शामिल लोगों की पहचान करने में जुटी है। बॉस स्कैम में APK फाइल हथियार 17 जुलाई को पेपर मील के मैनेजर संदीप गोयल के व्हाट्सएप पर एक APK फाइल आई। संदीप ने फाइल खोली और फिर उसे बंद कर दिया। उन्हें इसका अंदाजा तक नहीं था कि यह फाइल साइबर अपराधियों ने भेजी थी। एक्सपर्ट के मुताबिक, फाइल खोलने के बाद साइबर अपराधियों को उनके मोबाइल तक पहुंच मिल गई। साइबर थाना प्रभारी महावीर सिंह की मानें तो मोबाइल से ठगों को संदीप के संपर्कों और बातचीत से यह जानकारी मिल गई कि पेपर मिल के निदेशक प्रज्जवल अग्रवाल भुगतान से संबंधित निर्देश अक्सर उन्हें व्हाट्सएप पर भेजते हैं। ठगों ने इसी जानकारी को अपनी ठगी का आधार बना लिया। डायरेक्टर की फोटो लगाकर बनाया फर्जी व्हाट्सएप अकाउंट ठगों ने पेपर मिल निदेशक नीरज अग्रवाल के नाम और प्रोफाइल पिक्चर का इस्तेमाल करते हुए डुप्लीकेट कांटेक्ट तैयार किया। इसके बाद उसी फर्जी नंबर से संदीप गोयल को मैसेज भेजना शुरू कर दिया। मैसेज इस तरह किए गए कि संदीप को लगा कि निर्देश वास्तव में कंपनी के अधिकारी की ओर से ही दिए जा रहे हैं। पहले पटना, फिर असम के खाते में भेजे करोड़ों 17 जुलाई को फर्जी व्हाट्सएप नंबर से संदीप को मैसेज भेजकर पटना के बैंक खाते में एक करोड़ रुपये ट्रांसफर कराए गए। संदीप ने रकम ट्रांसफर कर दी। साइबर अपराधियों ने इसके बाद करीब 24 घंटे तक स्थिति पर नजर रखी। जब उन्हें कोई कार्रवाई होती नहीं दिखी तो उन्होंने दोबारा प्रयास किया जो सफल हो गया। 20 जुलाई को फिर मैसेज भेजकर असम के बैंक खाते में 80 लाख रुपये ट्रांसफर करने को कहा गया। संदीप ने यह रकम भी बताए गए खाते में भेज दी। प्रज्जवल लौटे तो खुल गया 1.80 करोड़ की ठगी का राज 20 जुलाई को प्रज्जवल अग्रवाल वापस कार्यालय पहुंचे। उन्होंने संदीप से उस 63 लाख रुपये की ट्रांजेक्शन के बारे में पूछा, जिसके लिए वह जाने से पहले बोलकर गए थे। संदीप ने बताया कि वह 63 लाख रुपये की ट्रांजेक्शन करना भूल गए, लेकिन बताए गए दो खातों में एक करोड़ और 80 लाख रुपये भेज दिए हैं। यह सुनते ही प्रज्जवल के होश उड़ गए। उन्होंने ऐसी कोई ट्रांजेक्शन करने के लिए बोला ही नहीं था। पता चला कि पूरा खेल साइबर अपराधियों का रचा हुआ था। 22 खातों में पहुंचाई रकम, फिर तीसरी-चौथी लेयर में शिफ्ट साइबर एक्सपर्ट की जांच में सामने आया कि ठगी गई रकम को साइबर अपराधियों ने सीधे अपने खाते में रखने के बजाय दूसरी लेयर के 22 बैंक खातों में ट्रांसफर किया। इसके बाद अधिकांश रकम को तीसरी और चौथी लेयर के खातों में शिफ्ट करते चले गए ताकि जल्दी से पुलिस इन तक पहुंच ना बना सके। इसी बीच प्रज्जवल अग्रवाल ने साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज की। पुलिस ने संबंधित बैंकों से संपर्क कर रकम फ्रीज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी। कार्रवाई के चलते 1.55 करोड़ रुपये फ्रीज हो गए। अब 24 लाख रुपये 35 खातों में फ्रीज बताए जा रहे हैं, जिनकी कड़ियां तीसरी और चौथी लेयर तक पहुंच रही हैं। ऐसे बचा जा सकता है बॉस स्कैम से पश्चिमी यूपी में अब तक दो मामले साइबर थाना प्रभारी महावीर सिंह के मुताबिक, यह अपेक्षाकृत नया तरीका है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस तरह के अब तक दो मामले सामने आए हैं। इसे 'बॉस स्कैम' कहा जा रहा है। इसमें साइबर अपराधी कर्मचारी के मोबाइल या डिजिटल अकाउंट तक पहुंच बनाकर उसके अधिकारी/बॉस की पहचान का इस्तेमाल करते हैं और फिर कर्मचारी से भुगतान करा लेते हैं। इसी तरह का एक मामला मुजफ्फरनगर में भी सामने आ चुका है।
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