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    बाराबंकी में घाघरा खतरे के निशान से 50 सेमी ऊपर:हेतमापुर में 10-12 मकान नदी में समाए, घर बचने की उम्मीद छोड़ी तो खुद ही तोड़ने लगे पक्के मकान

    9 hours ago

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    बाराबंकी में नेपाल से लगातार पानी छोड़े जाने के कारण घाघरा यानी सरयू नदी का जलस्तर बढ़ गया है। नदी खतरे के निशान से करीब 50 सेंटीमीटर ऊपर बह रही है। इससे रामनगर, सिरौलीगौसपुर और रामसनेहीघाट तहसील के सैकड़ों गांवों में बाढ़ और कटान का खतरा बढ़ गया है। रामनगर तहसील के हेतमापुर गांव में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। यहां नदी अब गांव के अंदर तक कटान कर रही है। हेतमापुर में अब तक 10 से 12 मकान सरयू की धारा में समा चुके हैं। पक्के मकानों को एक-एक कर नदी में बहता देखकर ग्रामीणों में दहशत है। हालात ऐसे हो गए हैं कि लोगों ने घर बचने की उम्मीद छोड़ दी है। ग्रामीण खुद ही पक्के मकानों को तोड़कर ईंट, दरवाजे, खिड़कियां, टीन शेड और घर का जरूरी सामान निकाल रहे हैं। घर के साथ रोजी-रोटी भी नदी के मुहाने पर कटान प्रभावित श्यामू मंदिर के पास छोटी मिठाई की दुकान चलाते हैं। इसी दुकान से उनके आठ लोगों के परिवार का गुजारा होता है। श्यामू बताते हैं कि अब घर के साथ उनकी रोजी-रोटी भी संकट में आ गई है। नदी लगातार जमीन काट रही है। ऐसे में परिवार को सुरक्षित रखने की चिंता सबसे बड़ी है। ग्रामीण बोले- समय रहते बचाव होता तो घर बच जाता राजू का आरोप है कि कटान को समय रहते रोका जा सकता था। उनका कहना है कि अगर बड़े पत्थर डालकर मजबूत बचाव कार्य कराया जाता तो शायद उनका मकान नदी में जाने से बच जाता। राजू के मुताबिक अधिकारी मौके पर आते रहे, लेकिन कटान रोकने के लिए ठोस इंतजाम नहीं हो सके। फिलहाल प्रशासन की ओर से प्रभावित लोगों को दो वक्त का खाना दिया जा रहा है। तीन तहसीलें बाढ़ से प्रभावित, घर बनाने का आश्वासन डीएम ईशान प्रताप सिंह ने बताया कि बाराबंकी में करीब एक महीने से बाढ़ के हालात बने हुए हैं। जिले की तीन तहसीलें प्रभावित हैं। बाढ़ प्रभावित लोगों को लगातार मदद दी जा रही है। जिन लोगों के मकान नदी में बह गए हैं, उन्हें नियमानुसार पट्टे की जमीन दी जाएगी। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उनके घर भी बनवाए जाएंगे। घर नहीं बचा तो गृहस्थी बचाने में जुटे ग्रामीण हेतमापुर में दिन-रात एक ही तस्वीर दिखाई दे रही है। कोई हथौड़े से दीवार तोड़ रहा है तो कोई ट्रैक्टर-ट्रॉली में सामान लादकर सुरक्षित जगह जा रहा है। वर्षों की मेहनत और जमा पूंजी से बनाए घरों को अपनी आंखों के सामने टूटता देखकर ग्रामीणों की आंखें नम हैं। नदी के कटान के सामने अब उनकी सबसे बड़ी कोशिश यही है कि घर भले न बचे, लेकिन उसकी गृहस्थी बच जाए।
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