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    फर्रुखाबाद में पांच दिन में 17 घर नदी में समाए:आशियाना बचाने को लोग खुद तोड़ रहे मकान, मोटरबोट और बैलगाड़ियों से पहुंचा रहे सामान

    3 hours ago

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    फर्रुखाबाद में गंगा नदी की बाढ़ और तेज कटान से दिलीप की मड़ैया और दौली की मड़ैया में हालात गंभीर बने हुए हैं। बीते पांच दिनों में अकेले दिलीप की मड़ैया में 17 मकान गंगा में समा चुके हैं। शनिवार को भी पांच और मकान नदी की धारा में बह गए। इससे कई परिवारों के सिर से आशियाने की छत छिन गई। लगातार बढ़ते जलस्तर के कारण ग्रामीण अब अपने बचे हुए मकानों को खुद तोड़कर ईंट, सरिया और अन्य सामान निकाल रहे हैं, ताकि कम से कम निर्माण सामग्री को सुरक्षित बचाया जा सके। शनिवार को दिलीप की मड़ैया में नरवीर का मकान कटान की चपेट में आ गया। इसके बाद दिनभर ग्रामीण अपने बचे हुए मकानों को तोड़कर सरिया और ईंटें निकालने में जुटे रहे। निर्माण सामग्री को बैलगाड़ियों और मोटरबोट की मदद से सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा रहा है। शाम करीब चार बजे के बाद कटान और तेज हो गया। देखते ही देखते स्वर्गीय गंगा सिंह की पत्नी प्रेमलता, प्रेमचंद्र, उनके पुत्र श्याम और राजेश के पक्के मकान भी गंगा में समा गए। गांव में अब लगभग सभी मकानों को तोड़ने का काम चल रहा है। ग्रामीणों को आशंका है कि जलस्तर इसी तरह बढ़ता रहा तो बचे हुए मकान भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। एक गली का हिस्सा ही सूखा बचा बाढ़ और कटान के कारण गांव की एक गली का केवल कुछ हिस्सा ही सूखा बचा है। ज्यादातर घरों में अब खाना पकाने की जगह तक नहीं बची है। खूंटों पर बंधे पशु भी भोजन के अभाव में परेशान हैं। ग्रामीण एक ओर अपने घरों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी ओर जरूरी सामान और निर्माण सामग्री निकालकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने में जुटे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने अपने घरों को बड़ी मेहनत और जमा-पूंजी लगाकर बनाया था, लेकिन अब मजबूरी में उन्हें खुद ही तोड़ना पड़ रहा है। मोटरबोट से गांव पहुंचीं नीरज इसी बीच गांव के महेंद्र के भाई स्वर्गीय अनेकराम की बेटी नीरज, जो शहर के मोहल्ला अमीन खां में रहती हैं, शनिवार को मोटरबोट से गांव पहुंचीं। उन्होंने अपनी चाची संतोषी देवी से मुलाकात की। नीरज ने बताया कि पिछले साल की बाढ़ में उनके पिता का मकान गिर गया था और उनके भाई राममूर्ति का निधन हो गया था। उनकी भाभी और मां अब कटरी धर्मपुर गोशाला के पास सड़क किनारे झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं। उन्होंने बताया कि उनके चाचा का मकान भी इस समय कटान के मुहाने पर है। पांच दिन में 17 मकान गंगा में समाए दिलीप की मड़ैया में बीते पांच दिनों में 17 मकान गंगा में समा चुके हैं। कुछ मकान अभी बचे हैं, लेकिन ग्रामीण उन्हें भी खुद तोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि मकानों से ईंट और सरिया निकालकर सुरक्षित स्थान पर ले जाएंगे। एक ग्रामीण ने कहा कि बर्बाद तो हम हो ही चुके हैं, अब कम से कम घर की निर्माण सामग्री ही बच जाए। ग्रामीणों के मुताबिक, किसी ने पिछले साल तो किसी ने दो साल पहले ही गांव में मकान बनवाया था। अब उन्हीं मकानों को अपने हाथों से तोड़ते समय उनका कलेजा कांप रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि घर तोड़ना उनकी मजबूरी है, क्योंकि गंगा का बढ़ता जलस्तर और तेज कटान किसी भी समय बचे हुए मकानों को भी अपनी चपेट में ले सकता है।
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