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    History of Iran Chapter 4 | ईरान-अमेरिका क्यों और कैसे बने एक-दूसरे के दुश्मन? |Teh Tak

    3 hours from now

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    मीडिल ईस्ट में इतने सारे देश हैं, लेकिन ईरान का नाम आप आए दिन सुनते होंगे। ईरान का हिजबुल्ला, हमास, हूती को समर्थन, उसके लिए मिसाइल हमला। इजरायल को धमकाना। लेकिन ऐसा क्या फायदा है ईरान का जो पूरी दुनिया के खिलाफ जाकर इन ग्रप्स के साथ खड़ा है और इजरायल और अमेरिका को आखें दिखा रहा है। वहीं अमेरिका और ईरान जो कभी एक दूसरे के अच्छे दोस्त और ट्रेडिंग पार्टनर थे, आज फूंटी आंख नहीं भाते हैं। अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसकी अर्थव्यवस्था को जमीन पर ला दिया। फिर भी ईरान सबकुछ दांव पर लगाकर अमेरिका के खिलाफ खड़ा है। इसे भी पढ़ें: History of Iran Chapter 2 | ईरान में शिया ज्यादा हैं सुन्नी?|Teh Takअमेरिकी एम्बेसी पर हमला और फिर ऐसे बिगड़े संबंध की कभी जुड़ न पाए1979 में ईरानी रेवोल्यूशन के दौर में नवंबर 4, 1979 को तेहरान की अमेरिकी एम्बेसी पर हमला हुआ। इसमें 63 लोगों को कब्जे में लिया गया। उसके बाद तीन और लोगों को बंदी बनाकर लाया गया।कुल 66 लोगों को बंदी बनाया गया। छात्रों ने बंधकों के बदले अमेरिका से शाह को लौटाने की मांग की जो उस वक्त ईरान से भागकर अमेरिका की पनाह में थे। अमेरिका ने जवाब में देश के बैंकों में मौजूद ईरान की संपत्ति जब्त कर ली। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बाकायदा आर्मी ऑपरेशन Eagle Claw की मदद से बंधकों को छुड़वाने की कोशिश भी की थी, लेकिन ये सफल न हो पाया। इस ऑपरेशन में 8 अमेरिकी सर्विसमैन और 1 ईरानी नागरिक की मौत भी हो गई थी। सितंबर में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला बोल दिया। ईरान को साथ की जरूरत थी। लेकिन लगभग सभी देशों की शर्त थी कि अमेरिकी नागरिकों को कैद में रख कर ईरान मदद की अपेक्षा नहीं कर सकता। जिसके बाद अल्जीरिया के राजनयिकों की मध्यस्थता से कुछ दिन बाद उनमें से कई लोगों को छोड़ा गया, लेकिन बचे 52 लोगों को तेहरान की अमेरिकी एम्बेसी में ही 444 दिनों तक रहना पड़ा यानी पूरे डेढ़ साल तक। इन 52 बंधकों को 20 जनवरी, 1981 में छुड़वाया गया था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने इसे ब्लैकमेल और आतंकवाद की घटना बताई थी। ये घटना इतनी ताकतवर थी कि अमेरिका में भी जिमी कार्टर को अपनी सत्ता गंवानी पड़ गई थी। इसे ईरान में अमेरिकी के दखल का विरोध बताया जा रहा था। इस घटना के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते कभी सामान्य नहीं हो पाए।इसे भी पढ़ें: History of Iran Chapter 3 | रेजा शाह पहलवी को गद्दी क्यों छोड़नी पड़ी |Teh Takओबामा ने साइन की ऐतिहासिक न्यूक्लियर डील, ट्रंप ने किया बैक-ऑफ2015 में जब ओबामा प्रेसिडेंट थे तो अमेरिका ने ईरान के साथ एक न्यूक्लियर डील साइन की थी। वर्ष 2015 में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई विश्व शक्तियों फ्रांस, ब्रिटेन,रूस, चीन और जर्मनी के बीच हुआ यह एक ऐतिहासिक समझौता था. सामूहिक रूप से इस समझौते को P5+1 के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन 8 मई 2018 को डोनाल़्ड ट्रंप ने इस न्यूक्लियर डील से अपने कदम वापस खींच लिए। उन्होंने कहा कि अमेरिका अब न्यूक्लियर डील में भागीदार नहीं होगा। उन्होंने कहा कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को नियंत्रित करने में विफल रहा। ट्रंप ने कहा था कि मीडिल ईस्ट में फैली अशांति के पीछे ईरान जिम्मेदार है। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता ही रहा। ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रमों पर लगे प्रतिबंधों को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। सऊदी अरब के तेल टैंकर पर ड्रोन अटैक हुआ तो अमेरिका ने आरोप लगाया कि ये ईरान ने करवाया है। 2019 में अमेरिका के एक ड्रोन को ईरान ने मार गिराया। ईरान ने कहा कि वो उनके हवाई क्षेत्र में घूम रहा था। कासिम सुलेमानी की मौत और बिगड़े रिश्ते8 अप्रैल 2019 को ट्रंप ने एक और अनोखे फैसले में ईरान की इस्लामिक रिव्यल्यूशनरी गार्ड कॉप्स को फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन का दर्जा दे दिया। ये पहली बार था जब किसी दूसरी देश की सेना को आतंकवादी संगठन कहा गया। 28 दिसंबर 2019 को इराक के अंदर मौजूद अमेरिकी मिल्ट्री बेस पर रॉकेट अटैक हुआ। इसमें एक अमेरिकी कॉट्रैक्टर की मौत हो गई। इस हमले के लिए अमेरिका ने ईरान की मीलिट्री को जिम्मेदार ठहराया। फिर आया जनवरी 2020 का वक्त जब फ्लोरिडा में अपने घर पर छुट्टियां मना रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आधी रात एक ट्वीट किया जिसमें एक शब्द भी नहीं लिखा बस अमेरिका के झंडे को पोस्ट भर कर दिया। दरअसल, ट्रंप के इस ट्वीट की क्रोनोलाजी इराक के बगदाद में अमेरिकी सेना के उस एयर स्ट्राइक से जुड़ी थी। जिसमें उसने ईरान के सबसे ताकतवर जनरल कासिम सुलेमानी को मार डाला। कासिम ही थे जो पश्चिम एशिया में ईरान के लिए किसी भी मिशन को अंजाम देते थे। कुद्स फोर्स ईरान के रेवॉल्यूशनरी गार्ड्स की विदेशी यूनिट का हिस्सा है। इसे ईरान की सबसे ताकतवर और धनी फौज माना जाता है। उनकी मौत से यकीनन एक मुल्क के तौर पर ईरान बुरी तरह जख्मी हुआ। ट्रंप ने उस वक्त कहा कि उन्हें खबर मिली थी कि जनरल सुलेमानी अमेरिका के खिलाफ किसी अटैक की प्लानिंग कर रहे थे। इसे भी पढ़ें: History of Iran Chapter 5 | ईरान पर क्या सच में हमला करेगा अमेरिका? |Teh Tak 
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