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    रामपुर में FIR की मांग खारिज करने का आदेश रद्द:हाईकोर्ट ने CJM को नए सिरे से सुनवाई करने का निर्देश दिया

    13 hours ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रामपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एफआईआर दर्ज कराने की मांग खारिज कर दी गई थी। न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने 25 मई 2026 के आदेश को निरस्त करते हुए मामला नए सिरे से तय करने के लिए मजिस्ट्रेट के पास वापस भेज दिया है। मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत एफआईआर दर्ज कराने की मांग से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने इस बात पर विचार नहीं किया कि आवेदन में लगाए गए आरोपों से संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं। जानिए क्या है मामला राज कौर ने आरोप लगाया था कि 4 अप्रैल 2026 को सुबह करीब 10 बजे खेत पर आरोपियों और 2-3 अज्ञात लोगों ने उनके पति और बेटे के साथ गाली-गलौज की। इसके बाद उन पर तलवार से जानलेवा हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया गया। राज कौर का कहना था कि राजनीतिक दबाव के कारण बिलासपुर थाने में उनकी एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने रामपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में आवेदन दाखिल किया। मजिस्ट्रेट ने पुलिस से रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट में बताया गया कि घटना वाले दिन दोनों पक्षों के बीच मारपीट हुई थी। इस मामले में एफआईआर दर्ज है और जांच चल रही है। मजिस्ट्रेट ने माना कि राज कौर ने यह तथ्य छिपाया कि उनके पति और बेटा पहले से दर्ज एफआईआर में आरोपी हैं। उन्होंने घायलों के मेडिकल दस्तावेज भी पेश नहीं किए थे। इसी आधार पर मजिस्ट्रेट ने माना कि याची साफ नीयत से अदालत नहीं आई हैं और उनका आवेदन खारिज कर दिया। याची ने कहा- न्यायिक विवेक का इस्तेमाल नहीं हुआ हाईकोर्ट में याची की ओर से दलील दी गई कि मजिस्ट्रेट ने न्यायिक विवेक का उचित इस्तेमाल नहीं किया। यदि शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है तो एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए जाने चाहिए थे। याची ने यह भी कहा कि सच्चाई का पता लगाने के लिए थाने और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का रिकॉर्ड मंगाया जाना चाहिए था। उनका तर्क था कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है और ऐसे मामले में प्रारंभिक जांच की अनुमति नहीं है। राज्य सरकार और विपक्षी संख्या 2 से 5 की ओर से याची की दलीलों का विरोध किया गया। उनकी ओर से कहा गया कि आवेदन झूठे और गढ़े हुए तथ्यों पर आधारित है। याची पक्ष के खिलाफ पहले ही एफआईआर में आरोप-पत्र दाखिल किया जा चुका है और बचाव के लिए यह आवेदन दिया गया है। यह भी दलील दी गई कि दोनों पक्ष एक ही परिवार के हैं। एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देना मजिस्ट्रेट के विवेकाधिकार में है। वह आवेदन को परिवाद के रूप में ले सकता है या उसे खारिज कर सकता है। चोटों की जीडी एंट्री को भी कोर्ट ने माना अहम हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस रिपोर्ट में दोनों पक्षों के बीच मारपीट और गाली-गलौज की बात सामने आई थी। ऐसे में घटना का दूसरा पक्ष भी जांच के दायरे में लिया जाना जरूरी था। याची ने 4 अप्रैल 2026 की रात 11:25 बजे की जनरल डायरी (जीडी) संख्या 75 की प्रति भी दाखिल की थी। इसमें दर्ज था कि राज कौर के पति कुलदीप सिंह और बेटे गुरशन सिंह को थाने लाया गया था। उनके शरीर पर चोटें पाई गई थीं और बेटे ने दर्द की शिकायत की थी। कोर्ट ने कहा कि केवल मेडिकल दस्तावेज पेश नहीं करने और पति-बेटे के खिलाफ पहले से मुकदमा दर्ज होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि याची साफ नीयत से अदालत नहीं आई हैं। खासकर तब, जब पुलिस रिपोर्ट में दोनों पक्षों के बीच मारपीट का जिक्र है और जीडी में चोटों की प्रविष्टि भी मौजूद है। नए सिरे से आवेदन तय करने का निर्देश हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के निष्कर्ष को स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत माना। कोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए 25 मई 2026 का आदेश रद्द कर दिया। साथ ही, निचली अदालत को राज कौर के आवेदन पर कानून के अनुसार नए सिरे से विचार कर निर्णय लेने का निर्देश दिया।
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