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    विश्वेश्वर के शहर में पूजे जाएंगे प्रथमेश:प्लास्टर ऑफ पेरिस से बन कर तैयार हुई प्रतिमा, कारीगर बोले- महंगाई से हाथ तंग

    56 minutes ago

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    वाराणसी में प्रथमेश यानी भगवान यानी भगवान् गणेश के आगमन को लेकर तैयारियां पूरी हो गयी हैं। 14 सितंबर से शहर के कई इलाकों में गणपति की मूर्तियां बैठाई जाएगी। इसमें रेशम कटरा की मूर्ती विशेष होगी। वहीं इस वर्ष भी मूर्तिकार गणपति की मूर्तियों को अंतिम रूप दे रहे हैं। ज्यादातर मूर्तियां प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनाई जा रही है। कारीगर इन्हे अंतिम रूप दे रहे हैं पर महंगाई ने इनके हाथ तंग कर दिए हैं। शहर के कई हिस्से राजस्थान के मूर्तिकार प्लास्टर ऑफ पेरिस इन्हे मूर्त रूप दे रहे हैं। ऐसे में दैनिक भास्कर ने इनसे बात की और जाना की इस बार महंगाई का कितना असर इनके कारोबार पर पड़ा है। पढ़िए रिपोर्ट… अब जानिए मूर्तिकारों ने क्या कहा… 6 महीने पहले से बनने लगती है मूर्तियां शिवपुर के तरना इलाके में साल 2002 से रह रहे राजस्थान की गीता ने बताया - कृष्ण जन्माष्टमी और गणपति के लिए मूर्तियां तैयार करते हैं। ये मूर्तियां छोटी होती हैं और इनके पंडाल के साथ ही साथ इन्हे लोग घरों में ऑफिसों में बैठाते हैं। ऐसे में हम लोगों 6 महीने पहले से मूर्तियां बनाएं शुरू कर देते हैं। जिसमें हर्बल कलर का इस्तेमाल किया जाता है। प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनती हैं मूर्तियां गीता ने बताया - गणेश जी की सभी मूर्तियां प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनायीं गयी हैं। ये सांचे से बनती है। और एक मूर्ती को सूखने में 4 से 5 दिन बारिश के समय में लगता है। आम दिनों में यह 24 घंटे में सूख जाती है। इसमें कहीं भी मिटटी का प्रयोग नहीं होता है। इसके बाद इसे सांचे से निकालकर एक दिन रखा जाता है। फिर घिसाई करके इसपर हर्बल कलर लगाया जाता है। 2000 से 10000 तक की मूर्तियां गीता ने बताया - हम लोग 20 इंच से लेकर 4 फुट तक मूर्तियां बनाते हैं। जिनकी कीमत 2000 से लेकर 10000 तक होती है। लेकिन कस्टमर हमारा मांगा हुआ रेट नहीं देते हैं। भगवान की मूर्तियां खरीदने में भी लोग मोलभाव करते हैं और पैसा कम करवा लेते हैं। ऐसे में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। महंगाई का पड़ा है असर गीता ने बताया - हमने इस वर्ष छोटी-बड़ी मूर्ती मिलकर कुल 500 मूर्तियां तैयार की है लेकिन अभी 100 भी नहीं बिकी है। जबकि 250 रुपए बोरी के पीओपी से यह बनाई जाती है। हमें हमारी लागत भी नहीं मिल रही है। ऐसे सरकार से अनुरोध है कि हमारा भी ध्यान दें। काशी में गणेश उत्सव का 129 साल पुराना इतिहास बताते चलें कि काशी में गणेश उत्सव का इतिहास 100 साल से भी अधिक पुराना है। कई मराठा परिवार महाराष्ट्र की तर्ज पर यहां इस उत्सव को मनाते हैं। शहर के अलग-अलग इलाकों में कई सार्वजनिक पंडालों में गणेश उत्सव मनाया जाता है। वाराणसी के राजमंदिर, ब्रह्माघाट, बीबी हटिया, पंचगंगा घाट समेत कई ऐसे इलाके हैं। जहां आज भी बड़ी संख्या में महाराष्ट्र की आबादी रहती है। इन्हीं मराठी परिवारों ने अपनी संस्कृति और सभ्यता को उत्तर प्रदेश में जीवित रखने के लिए महाराष्ट्र के इस महापर्व गणेश उत्सव की शुरुआत काशी में भी की। 129 साल से गणेश उत्सव काशी में अनवरत रूप से जारी है।
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