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    Asaram Bapu Medical Bail: 3 महीने पहले Ayodhya में पैदल चले, अब पेट में दर्द? SC ने मांगा जवाब

    2 hours from now

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    सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राजस्थान सरकार से कहा कि वह खुद को भगवान बताने वाले आसाराम की सेहत के बारे में सही जानकारी ले। आसाराम मेडिकल आधार पर अंतरिम ज़मानत की मांग कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि हम नहीं चाहते कि हम पर या आप पर कोई आरोप लगे। मेहता ने बेंच को बताया कि डॉक्टरों का कहना है कि यौन उत्पीड़न के मामले में दोषी ठहराए गए आसाराम को अपनी सेहत ठीक रखने के लिए जीवनशैली में कुछ बदलाव करने की ज़रूरत है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि हम नहीं चाहते कि कोई अनहोनी हो। मेहता ने कहा कि राज्य सरकार 20 जुलाई तक हलफ़नामा दाखिल करेगी।राजस्थान हाई कोर्ट ने 27 मई को 2013 में एक नाबालिग के साथ रेप के मामले में 80 से ज़्यादा उम्र के आसाराम को दोषी ठहराए जाने और उम्रकैद की सज़ा को बरकरार रखा था। उन्होंने सेहत के आधार पर अंतरिम ज़मानत के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दाखिल की है। यह मामला न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और पी.बी. वराले की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। मेहता ने अदालत को बताया,पेट की किसी समस्या के कारण थोड़ा खून बह रहा है, लेकिन यह अस्थायी प्रतीत होता है और आसाराम दवा ले रहे हैं। पीठ ने जवाब दिया हम केवल इतना ही कहेंगे कि कृपया उचित निर्देश लें क्योंकि हम कोई अप्रिय घटना नहीं चाहते। आसाराम के वकील ने कहा कि वह एक उच्च जोखिम वाले मरीज हैं। इसे भी पढ़ें: जेल में बंद आसाराम ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट से फिर लगाई गुहार, वकीलों ने दी इंटरनल ब्लीडिंग की दलीलजब आसाराम को पिछली बार रिहा किया गया थामेहता ने बताया कि तीन महीने पहले आसाराम अयोध्या और काशी विश्वनाथ गए थे और वे हर जगह पैदल चले थे। उस समय उन्हें इलाज के लिए अस्थायी रिहाई दी गई थी। बेंच ने इस मामले की सुनवाई के लिए 21 जुलाई की तारीख तय की है। 30 जून को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार से आसाराम की उस याचिका पर जवाब मांगा था, जिसमें उन्होंने हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने मामले में उनकी सज़ा और उम्रकैद को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस दौरान उन्हें अब तक दी जा रही मेडिकल सुविधा जारी रहनी चाहिए, बशर्ते संबंधित मेडिकल अथॉरिटी इससे संतुष्ट हो। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह छूट भी दी थी कि अगर उनकी हालत बिगड़ती है, तो वे इस मामले का तत्काल ज़िक्र कर सकते हैं।
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