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    'सडेन कार्डियक डेथ हिस्ट्री होने पर बच्चों की स्क्रीनिंग कराएं':हार्ट एक्सपर्ट बोले- सांस फूलने पर सतर्क रहें, लखनऊ में लेजर से होगा इलाज

    4 hours ago

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    बच्चों में सडेन कार्डियक डेथ के मामले अभी भी रेयर हैं। इनसे बचा जा सकता है। इसके लिए फोकस स्क्रीनिंग पर होनी चाहिए। सबसे पहले देखना होगा कि यदि परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, ग्रैंड पेरेंट्स या कोई और नजदीकी फैमिली मेंबर सडेन कार्डियक डेथ की चपेट में आया हो। खासकर यंग ऐज में, ऐसे सभी घरों के बच्चों और फैमिली मेंबर्स की स्क्रीनिंग बेहद जरूरी है। यह कहना है KGMU के लारी कार्डियोलॉजी विभाग के फैकल्टी डॉ.प्रवेश विश्वकर्मा का। उन्होंने कहा- यह देखना जरूरी है कि फैमिली में हार्ट की कोई जेनेटिक बीमारी तो नहीं है। दैनिक भास्कर ने सडेन डेथ के मामलों को लेकर KGMU के कार्डियोलॉजी एक्सपर्ट्स से बातचीत की। पढ़िए रिपोर्ट… बच्चों के पैरों में सूजन है तो सतर्क रहें डॉ. प्रवेश ने कहा- उन बच्चों को लेकर और भी अलर्ट होने की जरूरत है, जिन्हें सांस फूलने या तेज धड़कन की शिकायत के अलावा पैरों में सूजन है। ऐसे बच्चों को लेकर बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। इन्हें एक्सपर्ट कार्डियोलॉजिस्ट को जरूर दिखाकर चेकअप कराना चाहिए। सडेन डेथ के पीछे सिर्फ हार्ट अटैक वजह नहीं सडेन डेथ के पीछे की वजह सिर्फ हार्ट अटैक नहीं होती है। कई बार ब्रेन की वजह से भी सडेन डेथ होती है। ऐसे में यह कहा जा सकता हैं कि सभी मौत हार्ट अटैक की वजह से नहीं होती हैं। कॉन्फ्रेंस के दौरान दिग्गजों ने किया मंथन डॉ.प्रवेश वर्मा ने बताया- ऑल इंडिया कार्डियोलॉजी सोसाइटी की KGMU में 13 और 14 फरवरी को हुई स्टेट कॉन्फ्रेंस में देश के करीब 200 हार्ट स्पेशलिस्ट मौजूद रहे। इस दौरान सडेन डेथ के बढ़ते मामलों पर चर्चा हुई। दिग्गज कार्डियोलॉजिस्ट का ये मत था कि ऐसे मामलों की रोकथाम के लिए सबसे ज्यादा फोकस स्क्रीनिंग पर देने की जरूरत है। इसके अलावा जीवन शैली में आए बदलाव के चलते हो रहे डायबिटीज-बीपी जैसे रोगों से निपटने के लिए डाइट और एक्सरसाइज को लेकर अवेयरनेस भी बेहद जरूरी है। अब जानिए मॉर्डन लेजर तकनीकी के बारे में… कॉम्प्लेक्स एंजियोप्लास्टी के केस हैंडल होंगे लारी कार्डियोलॉजी विभाग में जल्द ही अत्याधुनिक लेजर तकनीक शुरू होने जा रही है, जिससे दिल की बंद नसों को खोलना और आसान हो जाएगा। करीब पांच करोड़ रुपए की लागत से यह सुविधा शुरू की जा रही है। इस तकनीक के आने से कई मरीजों को मेटल स्टेंट लगवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लारी कार्डियोलॉजी के एचओडी डॉ. ऋषि सेठी ने बताया- अगले दो से तीन महीनों में लेजर मशीन विभाग में स्थापित कर दी जाएगी। दिल की नसों में अक्सर कैल्शियम जम जाता है, जिससे खून का प्रवाह रुक जाता है। सामान्य एंजियोप्लास्टी में तार और गुब्बारे के जरिए रास्ता बनाया जाता है, लेकिन कई मामलों में कैल्शियम सख्त होने के कारण स्टेंट लगाना पड़ता है। नई लेजर तकनीक से इस सख्त परत को हटाना आसान होगा। 10 से 15% मरीजों को लाभ मिलेगा डॉक्टरों के अनुसार, जिन मरीजों की नसों में कम रुकावट होगी, उनमें स्टेंट लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे भविष्य में होने वाली जटिलताओं का खतरा भी कम होगा। अनुमान है कि करीब 10 से 15% मरीजों को इस तकनीक से विशेष लाभ मिलेगा। यूपी का पहली लेजर मशीन डॉ. ऋषि सेठी ने बताया- कार्डियोलॉजी विभाग में प्रयोग में लाने वाला यह उत्तर प्रदेश का पहला लेजर होगा। फिलहाल सरकारी संस्थाओं के अगर बात करें तो देश में फिलहाल AFMC पुणे, यूएन मेहता हॉस्पिटल अहमदाबाद और रायपुर के एक चिकित्सा संस्थान में हैं। इसके अलावा किसी अन्य सरकारी मेडिकल संस्थान में इसके होने की जानकारी नहीं हैं। उन्होंने बताया कि लखनऊ के तमाम कॉरपोरेट और निजी संस्थानों में भी अभी ये मशीन नहीं है। रिपीट स्टंट के मरीजों के लिए भी फायदेमंद डॉ. ऋषि सेठी ने बताया- कई बार हार्ट के मरीजों में स्टंट जहां प्लेस हुआ है, उस लोकेशन पर या उसके आसपास वाली लोकेशन पर भी ब्लॉकेज होने लगता है। ऐसे मामलों में रिपीट स्टंट बेहद क्रिटिकल होता है। लेजर तकनीक उन सभी केसेस के लिए बेहद फायदेमंद है। इसके जरिए पहले से पड़े हुए गैर जरूरी स्टंट को बिना किसी बॉडी ऑर्गन को डैमेज किया, बाहर भी निकाला जा सकता है। ऐसे में लेजर विधि की कई खूबी गंभीर मरीजों को बड़ी राहत देने वाली हैं। हार्ट में मौजूद चिपचिपे पदार्थ को बाहर निकालने में आसान डॉ.ऋषि सेठी ने बताया- कई बार हाई कोलेस्ट्रॉल के चलते हार्ट के ब्लड वेसल्स में भारी मात्रा में चिपचिपा पदार्थ भी मौजूद रहता है। ऐसे मरीजों में एंजियोग्राफी के दौरान स्टंट डालना संभव नहीं हो पता। इसके अलावा स्टंट को सही पॉइंट पर रीलोकेट करके फिक्स करना भी कठिन होता है। इन मरीजों के लिए भी लेजर विधि वरदान का काम करती है। ऐसे मरीजों में लेजर विधि से चिपचिपे पदार्थ को ब्लड में घोलकर आसानी से निकाला जा सकता है।
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