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    वाराणसी में रथयात्रा का दूसरा दिन:2 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने किए दर्शन, पूर्व MLC बृजेश सिंह ने परिवार संग उतारी प्रभु जगन्नाथ की आरती

    4 hours ago

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    वाराणसी की ऐतिहासिक रथयात्रा में दूसरे दिन भी श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा। शुक्रवार को काशी राज परिवार के कुंवर अनंत नारायण सिंह ने भगवान जगन्नाथ के दर्शन-पूजन किए। उन्होंने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर प्रदेश और देश की सुख-समृद्धि की कामना की। वहीं, मेले में अब तक 2 लाख से अधिक श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर चुके हैं। पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह भी परिवार के साथ आरती में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि इस बार रथयात्रा का स्वरूप पहले से अधिक भव्य है और हर साल इसका विस्तार हो रहा है। पूर्व MLC बृजेश सिंह परिवार के साथ पहुंचे रथयात्रा मेले के दूसरे दिन भगवान जगन्नाथ को लाल वस्त्र धारण कराए गए। जगन्नाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह दोपहर करीब 3 बजे परिवार के साथ मंदिर पहुंचे। उन्होंने भगवान जगन्नाथ की आरती की और दर्शन-पूजन किया। बृजेश सिंह ने कहा कि इस बार मेले का स्वरूप पहले से अधिक भव्य है। भगवान की विशेष सजावट की गई है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। उन्होंने लोगों से परिवार सहित रथयात्रा मेले में आने की अपील की। साथ ही कहा कि आने वाले वर्षों में यह मेला और भी अधिक भव्य होगा। काशी में जगन्नाथ मंदिर की स्थापना की रोचक कहानी काशी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की स्थापना का इतिहास भी बेहद रोचक है। लगभग वर्ष 1780 में जगन्नाथ पुरी मंदिर के मुख्य पुजारी तेजोमय ब्रह्मचारी का कटक राज्य के राजा से किसी बात को लेकर विवाद हो गया। इसके बाद वे नाराज होकर काशी आ गए। मंदिर के पुजारी राधेश्याम के अनुसार, कटक के राजा जानते थे कि तेजोमय ब्रह्मचारी केवल भगवान जगन्नाथ का प्रसाद ही ग्रहण करते हैं। इसलिए उन्होंने पुरी से नियमित रूप से काशी प्रसाद भेजने की व्यवस्था कर दी। बाढ़ के कारण कई सप्ताह रहे भूखे वर्ष 1784 में नदियों में भीषण बाढ़ आने के कारण पुरी से काशी तक प्रसाद पहुंचना संभव नहीं हो सका। परिणामस्वरूप तेजोमय ब्रह्मचारी कई सप्ताह तक भूखे रहे। इसी दौरान उन्हें एक रात स्वप्न में भगवान जगन्नाथ के दर्शन हुए। स्वप्न में भगवान ने उन्हें काशी में ही अपना मंदिर स्थापित कर भोग लगाने और उसी प्रसाद को ग्रहण करने का निर्देश दिया। इसके बाद तेजोमय ब्रह्मचारी ने बेनीराम शापुरी और विश्वम्भरनाथ शापुरी से संपर्क किया। उनके प्रयासों से राजा बेंकोजी ने मंदिर निर्माण के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता प्रदान की। 1790 में हुई मंदिर की स्थापना, 1802 से शुरू हुई रथयात्रा वर्ष 1790 में काशी में भगवान जगन्नाथ मंदिर की स्थापना हुई। इसके बाद वर्ष 1802 में रथयात्रा की परंपरा शुरू हुई, जो आज तक निरंतर चली आ रही है। भगवान जगन्नाथ जिस रथ पर विराजमान होकर तीन दिनों तक भक्तों को दर्शन देते हैं, वह रथ भी विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि श्री यंत्र की संरचना पर आधारित इस रथ का स्पर्श करने मात्र से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। काशी की रथयात्रा का इतिहास लगभग 224 वर्षों से अधिक पुराना माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु जगन्नाथ पुरी नहीं जा पाते, उन्हें यदि काशी की रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के दर्शन हो जाएं, तो उन्हें पुरी धाम के दर्शन के समान पुण्य प्राप्त होता है।
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