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    वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजने की शर्त क्रूरता:जज बोले- यह भारतीय संस्कृति का अपमान, पत्नी पर लगाया एक लाख का जुर्माना, तलाक़ मंजूर किया

    2 hours ago

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    बरेली की एक अदालत ने तलाक के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पत्नी की प्रताड़ना को 'मानसिक हत्या' के समान माना है। न्यायाधीश ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी ने देशभर में चर्चित अतुल सुभाष सुसाइड केस का उदाहरण देते हुए कहा कि जब एक पत्नी अपने पति पर बूढ़े मां-बाप को छोड़ने या उन्हें वृद्धाश्रम भेजने का दबाव डालती है, तो वह पति को उसी मानसिक मौत की ओर धकेलती है जिससे तंग आकर अतुल सुभाष जैसे लोग जान दे देते हैं। कोर्ट ने इसे 'पाप' और 'क्रूरता' करार देते हुए न केवल पति को तलाक की मंजूरी दी, बल्कि झूठे मुकदमों में फंसाने और कोर्ट का समय बर्बाद करने के लिए पत्नी पर भारी जुर्माना भी लगाया है। जज ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला बरेली के अपर प्रधान न्यायाधीश (परिवार न्यायालय-तृतीय) ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की अदालत ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पति पर उसके वृद्ध माता-पिता को छोड़ने या उन्हें वृद्धाश्रम भेजने का दबाव बनाना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। अदालत ने दिल्ली निवासी अंकुश जायसवाल की याचिका को स्वीकार करते हुए, उनकी पत्नी रिंकू जायसवाल के साथ 14 साल पुराने वैवाहिक संबंधों को विच्छेद (तलाक) करने का आदेश दिया है। अदालत ने अपने विस्तृत निर्णय में न केवल साक्ष्यों का विश्लेषण किया, बल्कि समाज के उस 'आधुनिक' वर्ग को भी आईना दिखाया जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर संस्कारों की बलि दे रहा है। विवाह से हनीमून तक: 'दरिद्र' और 'कंजूस' जैसे तानों से शुरू हुआ सफर अंकुश और रिंकू का विवाह 23 अप्रैल 2012 को दिल्ली में धूमधाम से हुआ था। अंकुश जो कि एसबीआई कार्ड्स में जोनल मैनेजर हैं, उन्होंने अपनी क्षमतानुसार बेहतर इंतजाम किए थे। विवाद की शुरुआत शादी के दूसरे दिन ही हो गई जब अंकुश ने गोवा के हनीमून प्लान के बारे में बताया। रिंकू इस बात पर भड़क गईं कि उन्हें विदेश क्यों नहीं ले जाया जा रहा। उन्होंने अंकुश को सबके सामने 'कंजूस' और 'दरिद्र' तक कह डाला। गोवा पहुंचने पर भी विवाद कम नहीं हुआ। रिंकू ने फोर-स्टार रिजॉर्ट में रुकने से मना कर दिया और पति की वित्तीय स्थिति का मजाक उड़ाया। अंकुश ने बताया कि उन्होंने पत्नी को खुश रखने के लिए कर्ज और क्षमता से बाहर जाकर खर्च किया, लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ अपमान मिला। घर का माहौल: सास सीढ़ियां चढ़कर खाना देती थी, बहू जूठे बर्तन बेड के नीचे सरका देती थी कोर्ट में पेश किए गए तथ्यों के अनुसार, रिंकू ने ससुराल में कभी खुद को परिवार का हिस्सा नहीं माना। वह दिल्ली स्थित घर की पहली मंजिल पर रहती थीं और वृद्ध सास-ससुर नीचे। अंकुश की मां, जो जोड़ों के दर्द से परेशान थीं, खुद खाना लेकर ऊपर जाती थीं। रिंकू खाना खाने के बाद जूठे बर्तन वहीं पलंग के नीचे रख देती थीं। अंकुश का आरोप था कि रिंकू घर का कोई काम नहीं करती थीं, दिन भर टीवी देखतीं या फोन पर बात करती थीं। जब अंकुश उन्हें समझाने की कोशिश करते, तो वह चप्पल, रिमोट या जो भी हाथ में आता, फेंक कर मारती थीं। अजीबोगरीब मांगें: आधी रात को सड़क पर टहलना और मां के कुंडल बिकवाकर मोबाइल खरीदना खबर के मुताबिक, प्रतिवादिनी (पत्नी) अक्सर आधी रात को पति को नींद से जगाकर बाहर टहलने की जिद करती थीं। सुरक्षा कारणों से मना करने पर वह खुद को नुकसान पहुंचाने की धमकी देकर अकेले निकल जाती थीं। हद तो तब हो गई जब रिंकू ने नया मोबाइल खरीदने के लिए अपनी सास के सोने के कुंडल बिकवा दिए। अंकुश ने गृहस्थी बचाने के नाम पर अपनी मां को इसके लिए राजी किया, जो आज के समय में संस्कारों की पराकाष्ठा है। झूठे मुकदमों का जाल: 377 जैसी गंभीर धाराएं लगाकर जेल भेजने की कोशिश जब विवाद बढ़ा और अंकुश ने दिल्ली हाईकोर्ट के मध्यस्थता केंद्र में गुहार लगाई, तो रिंकू ने बरेली के महिला थाने में दहेज उत्पीड़न (498A) और अप्राकृतिक कृत्य (377) जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करा दिया। हालांकि, पुलिस जांच और हाई कोर्ट की टिप्पणियों में ये आरोप प्रथम दृष्टया संदिग्ध पाए गए। कोर्ट ने नोट किया कि रिंकू ने अंकुश की उस चचेरी बहन और बहनोई को भी नामजद कर दिया जिनसे वह कभी मिली तक नहीं थी। न्यायालय की तीखी टिप्पणी: “समुद्र में अथाह जल है पर पीने योग्य नहीं” न्यायाधीश ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी ने अपने निर्णय में संस्कारों और शिक्षा के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने लिखा: “प्रतिवादिनी उच्च शिक्षित है, शिक्षिका है, लेकिन उनमें पारिवारिक मूल्यों का अभाव है। यह वैसा ही है जैसे समुद्र में अथाह जल हो लेकिन वह पीने योग्य न हो। उच्च शिक्षा के बावजूद संस्कारों का अभाव भोजन में स्वाद न होने जैसा है।” अदालत ने यह भी कहा कि जो लड़कियां सिर्फ पति के साथ एकाकी जीवन जीना चाहती हैं, उन्हें शादी के बायोडाटा में पहले ही लिख देना चाहिए कि उन्हें ऐसा वर चाहिए जिसके माता-पिता न हों। वृद्ध माता-पिता से उनका सहारा छीनना एक 'पाप' है। विवाद से तलाक तक: घटनाक्रम की पूरी टाइमलाइन (Timeline) अंतिम फैसला: संबंध अब 'मृतप्राय' हो चुका है अदालत ने माना कि 2014 से दोनों अलग रह रहे हैं। पत्नी ने न केवल शारीरिक और मानसिक क्रूरता की, बल्कि बिना किसी ठोस कारण के पति का परित्याग (Desertion) भी किया। कोर्ट ने अंकुश के पक्ष को सत्य पाया क्योंकि उन्होंने हर तारीख पर दिल्ली से बरेली आकर मुकदमे का सामना किया, जबकि पत्नी पक्ष ने केवल समय खराब करने की कोशिश की। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि यह विवाह अब पूरी तरह टूट चुका है और इसे खींचना दोनों पक्षों के लिए और अधिक क्रूरता होगी। क्या था अतुल सुभाष केस? (जिसका जज ने जिक्र किया) अतुल सुभाष एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे, जिन्होंने अपनी पत्नी और ससुराल वालों की कथित प्रताड़ना और 'झूठे मुकदमों' से तंग आकर सोशल मीडिया पर अपना दर्द साझा करने के बाद आत्महत्या कर ली थी। बरेली कोर्ट ने इसी केस का हवाला देकर यह संदेश दिया है कि अब अदालतों में पतियों के प्रति होने वाली ऐसी क्रूरता को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा
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